अलवर चुनाव में दया सिंह तलवार भांजने को तैयार

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  • अलवर में उपचुनाव होना है। पिछले दिनों भाजपा सांसद की मौत के बाद यह सीट खाली हुई है। इस उपचुनाव पर दल की ही नही पूरे देश की निगाह टिकी हुई है।

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इस चुनाव में अलवर दलों के दलदल से बाहर निकलना चाहता है। सभी दलों के चाल चेहरा चरित्र और चिंतन एक हो जाने के कारण जनता की आंखें खुली है। एक व्यापक जन हस्तक्षेप की स्थिति बन रही है। जनता केवल मतदाता सूची बनकर रहना नही चाहती। दलों के सामन्ती चेहरा को बेनकाब करना चाहती है। जनता का यह उम्मीदवार देश का उम्मीदवार साबित होगा। यह देश बनाम दल की लड़ाई होगी। घृणा के त्रिशूल बनाम प्रेम के फूल की लड़ाई होगी।

दया सिंह मानवीय संवेदना के शिखर पुरुष हैं। इतिहासबोध के साथ साथ इनके पास सम्बन्धबोध भी है । इस कारण दया सिंह सरकार नही बल्कि सरोकार की राजनीति के लिए सियासी समर में कूद रहे हैं। दया सिंह पहचान के मोहताज नही हैं। इनकी प्रतिबद्धता ही इनकी पहचान है। सांझी शहादत और सांझी विरासत को बचाना इनकी चेतना के केंद्र में है। दया सिंह अपनी सर्वस्पर्शी पहल को मर्मस्पर्शी बना दे रहे हैं।

यह मर्म जम्हूरियत की जंग जीतने का है। इनके मूल्य और मानक को बचाने का है।

राजनीतिक लफ्फाजी के खिलाफ दया की ललकार देश का ध्यान खींच रही है। अलवर का चुनाव जन-हस्तक्षेप की एक लैब साबित होगा। स्वमना स्वधर्मी समूहों को एक मंच पर जुटना शुरू हो गया है। दया सिंह की बूढ़ी हड्डी में जागा जोश पुराना है। तैयारी शरू है। यह एक जंग है। और इस जंग में कुरैशी, विमल त्रिवेदी, हर्ष मेहता, तुषार परमार जैसे साथियों की ताकत लगाने की लोगों से अपील है।

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