गौ-साधना ही हमारी राष्ट्र-साधना है- ईश्वर दास

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पर्वतों का प्रवक्ता हिमालय है ।नदियों की प्रवक्ता गंगा है ।पुस्तकों की प्रवक्ता गीता है। भारत का प्रवक्ता गांधी है।संस्कृति का प्रवक्ता गांव है। पर गाय पशुओं की प्रवक्ता ही नहीं, बल्कि वात्सल्य की प्रवक्ता है ।गाय,गांव ,गंगा , गीता और गांधी के बिना भारत का इतिहास अधूरा है। आज देश का ऋषि और कृषि दोनों संकट में है। इसे बचाना इस वक्त की एक ज़रूरी जरूरत है। गौहत्या का सवाल देश की आत्महत्या है। इस आत्महंता समाज का वर्तमान और भविष्य दोनों खतरे में है।गाय को राजनीतिक पशु बनाना अफसोसजनक है । इस खेल से सत्ता तो सुरक्षित हो सकती है लेकिन देश की गायें सुरक्षित नहीं हो सकती है। केवल गौभक्ति से गाय नहीं बचेगी, गाय बचेगी गौ पालन और गौ संरक्षण से । गौ पालन का आशय किसी डेयरी फार्म से नहीं बल्कि गौपालकों से है। इस दिशा में हरिद्वार में स्थापित कृष्णायन गौरक्षा शाला की पहल प्रेरक और प्रभावी है ।

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उपर्युक्त बातें कृष्णायन गौरक्षा शाला के अध्यक्ष एवं महामंडलेश्वर ईश्वरदास जी महाराज ने एक मुलाकात में कही। ईश्वरदास जी महाराज का शहस्त्राब्दि सह अंतरार्ष्ट्रीय संत सम्मेलन में भाग लेने बिहार के आरा जिला में उनका आगमन हुआ है । इस सम्मेलन में राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त संतों, आचार्यों , महामंडलेश्वर एवं वैष्णव सम्प्रदाय के प्रमुख भाष्यकारों का आगमन सुनिश्चित हुआ है। ईश्वरदास जी ने मुलाकात में बताया कि इस संत समागम से गाय, गंगा और गीता से जुड़े सवाल समाधान तक पहुंचेंगे।उन्होंने अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि कुछ मुट्ठी भर पाखंडी और स्वार्थी शक्तियां इस सनातन समाज और संस्कृति को कलंकित करने में लगी हुई हैं ।
यह संत नहीं शिकारी हैं। बाबा नहीं बहेलिया और व्यापारी हैं ।
यह शिकारी और व्यापारी संत समाज के प्रतिनिधि नहीं है। ऐसे लोगों से समाज को सावधान और सजग रहने की आवश्यकता है ।
उन्होंने यह भी कहा कि गाय के नाम पर अराजकता पैदा करने वाली ताकतें बेनकाब होनी चाहिए । ये लोग गाय बोल सकते हैं लेकिन गाय जी नहीं सकते हैं ।इनके लिए गाय व्यापार का हिस्सा है, परिवार का नहीं । उन्होंने आगे बताया कि 2 अक्टूबर से गौ संस्कृति और समाज की रक्षा और सुरक्षा की दिल्ली से जो गंभीर पहल हुई है, वह प्रणम्य और प्रेरक है ।

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