चुनावी राजनीति के फेर में संसद के शीतकालीन सत्र पर अनिश्चितता के बादल

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    स्वराज डेस्क

    संसद के शीतकालीन सत्र पर इस बार अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।  यह होगा या नहीं होगा? होगा तो कब और कितने दिन का? इन तमाम सवालों पर अभी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने फैसला नहीं किया है।  यानी सत्र हुआ भी तो इसमें विलंब होना तय है। माना जा रहा है कि   यह लेट-लतीफी मोदी सरकार के लिए परेशानी का कारण भी बन सकती है।
    सूत्र बताते हैं कि राज्य सभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व में कांग्रेस के रणनीतिकार इस मुद्दे पर विपक्षी दलों को एकजुट कर रहे हैं।  आजाद के बारे में बताया जाता है कि वे अब तक 18 विपक्षी दलों के नेताओं से बात कर चुके हैं।  इनमें वाम दल, डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम), जद-यू (जनता दल-यूनाइटेड) का शरद यादव गुट, तृणमूल कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) आदि प्रमुख हैं।
    माना जा रहा है कि सभी विपक्षी दलों की अगले सप्ताह दिल्ली में बैठक हो सकती है।  इसके बाद बाद संसद के शीतकालीन सत्र में देरी का मसला राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद तक भी ले जाया जा सकता है।  इस मुद्दे को सत्र के दौरान किस तरह उठाया जाए इस पर भी बैठक के दौरान विपक्ष की संयुक्त रणनीति तय की जा सकती है।  नोटबंदी-जीएसटी जैसे मसलों पर भी समन्वय बेहतर करने के बारे में इस बैठक में बातचीत की जा सकती है।
    ग़ौरतलब है कि संसद का शीतकालीन सत्र अमूमन नवंबर के तीसरे सप्ताह से शुरू हो जाता है।  परंपरा के मुताबिक इस बारे में सांसदों को 15 दिन पहले बता दिया जाता है।  लेकिन इस बार गुजरात विधानसभा चुनाव के चक्कर में सत्र के बारे में अब तक कोई फैसला ही नहीं किया गया है।  सूत्र बताते हैं कि संसदीय मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की 17 नवंबर को बैठक होने वाली है।  इसमें संसद सत्र के बारे में फैसला हो सकता है।

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