ठगी और झांसातंत्र लोकतंत्र पर हावी

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    अखिलेश अखिल की कलम से

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    आधुनिक लोकतंत्र की कोई ऐसी सुनिश्चित सर्वमान्य परिभाषा नहीं की जा सकती जो इस शब्द के पीछे छिपे हुए संपूर्ण इतिहास तथा अर्थ को अपने में समाहित करती हो। भिन्न-भिन्न युगों में विभिन्न विचारकों ने इसकी अलग-अलग परिभाषाएँ की हैं,परंतु यह सर्वदा स्वीकार किया है कि लोकतंत्रीय व्यवस्था वह है जिसमें जनता की संप्रभुता हो। जनता का क्या अर्थ है,संप्रभुता कैसी हो और कैसे संभव हो, यह सब विवादास्पद विषय रहे हैं। फिर भी,जहाँ तक लोकतंत्र की परिभाषा का प्रश्न है अब्राहम लिंकन की परिभाषा – लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन-प्रामाणिक मानी जाती है। लोकतंत्र में जनता ही सत्ताधारी होती है, उसकी अनुमति से शासन होता है, उसकी प्रगति ही शासन का एकमात्र लक्ष्य माना जाता है। परंतु लोकतंत्र केवल एक विशिष्ट प्रकार की शासन प्रणाली ही नहीं है वरन् एक विशेष प्रकार के राजनीतिक संगठन, सामाजिक संगठन,आर्थिक व्यवस्था तथा एक नैतिक एवं मानसिक भावना का नाम भी है। लोकतंत्र जीवन का समग्र दर्शन है जिसकी व्यापक परिधि में मानव के सभी पहलू आ जाते हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि जिस जनता को केंद्र में रखकर लोकतंत्र की कहानी बतायी जाती है उसमे जनता की भूमिका तो कहीं दिखती नहीं। हर पांच साल पर जनता ठगी और झांसे का शिकार होकर अधिकतर आरोपी राजनीतिक पार्टी [गिरोह कहना ज्यादा उचित जान पड़ता है] या अधिकतर दागदार उम्मीदवारों [जिन्हे नेता तो कतई नहीं कहा जा सकता ] को चुनाव में विजय श्री का माला पहना देती है। जनता की भूमिका यहीं तक रहती है। इसके बाद जनता परदे के पीछे चली जाती है। चूकि निर्णय जनता का होता है इसलिए जितने वाले गिरोह और उसके कथित नेता इसे लोकतंत्र का दुहाई देते हुए अपने मन के मुताविक वह हर काम करना शुरू कर देते हैं जिसकी कल्पना जनता को नहीं होती। सरकार तो बनती है जनता की मर्जी से [झांसे में फसकर ] लेकिन सरकार बनते ही हुकूमत चलने लगती है गिरोह और उसके कथित नेताओं की।
    कहते हैं कि लोकतंत्र के कुछ दुश्मन भी होते हैं। ये दुश्मन लोकतंत्र को कमजोर करते हैं और ये भी कहा जाता है कि अगर ये दुश्मन लोकतंत्र में मौजूद हैं तो फिर जनता की उम्मीदों वाला लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती। विद्वानों ने लोकतंत्र के दुश्मनो के रूप में भ्रष्टाचार,उग्रवाद, आतंकवाद, हिंसा,वंशवाद, परिवारवाद, कॉर्पोरेट वाद,राजनैतिक अधिनायक प्रवृति , निरंकुश शासकीय व्यवस्था, अवांछित गोपनीयता, प्रेस पर रोक,अशिक्षा एवं निरक्षरता को चिन्हित किया है। क्या कोई बता सकता है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसे कोई दुश्मन हैं जो हमारे बीच नहीं हैं। देश के अधिकतर गिरोह रूपी राजनीतिक दल भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। कोई भी ऐसी सत्ताधारी पार्टी नहीं है या फिर विपक्ष में रहने वाली पार्टी नहीं है जिनपर भ्रष्टाचार के दाग नहीं लगे हों। जब पार्टी ही बेदाग़ नहीं है तो उनके कर्ताधर्ता बेदाग़ कैसे होंगे ? और दागदार पार्टी और दागदार नेता कभी लोकतंत्र के मूल्यों पर नहीं चलते। और अगर मूल्यों पर चलेंगे तो राजनीति नहीं कर सकेंगे। क्योंकि राजनीति एक पाखंड है और पाखंडी राजनीति में झांसातंत्र जिसका जितना बड़ा और सटीक है उसकी जीत होती रहती है।
    भारत में राजनीति करने के नाम पर जो तंत्र आप देख रहे हैं उसके बायोडाट को पढ़िए तो पता चलता है कि इनमे से 99 फीसदी लोग झूठ,ठगी,बलात्कार,हिंसा,आर्थिक गवन,राजनितिक ठगी ,वादा खिलाफी,धार्मिक उन्माद जैसे हिंसा के पुजारी रहे हैं। ऐसे में जो लोग खुद भ्रष्टाचार और कदाचार में फसे हों वे देश को आगे बढ़ाने की बात जब करते हैं तो साफ़ हो जाता है कि वे फिर एक अलग तरह का झांसा लोगों को दे रहे हैं। लेकिन जनता खुद लोभी और लालची होती है इसलिए नेताओं के झांसे और भी मजबूत हो जाते हैं। उनके झांसे जनता की अदालत में बिक जाते है।
    लोकतंत्र का एक बड़ा दुश्मन परिवारवाद और वंशवाद है। किसके बारे में क्या कहा जाए ? पूरी राजनीति इसी वाद के बीच में फसी है। क्षेत्रीय पार्टियों [जाति ,धर्म और वर्ग के आधार पर संगठित गिरोह ] की बात मत कीजिये। जिसने ऐसी पार्टियों का निर्माण किया वे इसके स्वंभू राजा है,नायक है और अधिपति भी। ऐसे गिरोह में काम करने वाले कथित लम्बे पैजामा -कुर्ता धारी नेता रूपी जीव के सामने एक ही लक्ष्य होता है कि कैसे अपने आका को खुश रखा जाए और मौक़ा मिलने पर कैसे देश और राज्य को चुना लगाया जाय। धर्म,जाति,वर्ग और गिरोह में बंटी जनता को भी यह खेल खूब भाता है इसलिए जरुरत पड़ने पर जनता भी ऐसे गिरोह के समर्थन में लाठी लेकर नर्तन करते दिखती रहती है।
    उधर देश कि बड़ी राजनीतिक पार्टियां [ बड़ा गिरोह ,जिनका कारोबार कई राज्यों तक फैला हो ] भी ऐसे किसी भी खेल से वंचित नहीं हैं जो लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। जो लोकतंत्र के दुश्मन हों। तमाम क्षेत्रीय पार्टियों के गुण अब इन बड़े दलों में समाहित हो गए हैं। चूँकि इनका कारोबार बड़े स्तर पर होता है,देश व्यापी होता है और राष्ट्रीय स्तर पर होता है इसलिए इनके यहां झांसा देने और ठगी करने के लिए बजाफ्ता एक तंत्र विकसित किया जाता है ताकि लोभी जनता को उनके धर्म,जाति,समुदाय,क्षेत्र के हिसाब से जाल में फसाया जा सके।
    आज देश में क्या हो रहा है? हम आजतक गरीब हैं लेकिन अमेरिका ,रूस और चीन से आगे बढ़ने का झांसा दे रहे हैं। हम आज भी सबसे ज्यादा अशिक्षित है लेकिन सबसे ज्यादा शिक्षित होने का दम्भ भर रहे हैं। आज हम सबसे ज्यादा जाति और धर्म के खेल में व्यस्त हैं लेकिन फिर भी सेक्युलर की राजनीति करते नहीं थकते। आज हमारे देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है लेकिन कुछ होता नहीं दिखता। लेकिन हम सब झांसे में फसे लोकतंत्र की दुहाई देने से नहीं चूकते।
    गिरोहबाज लोगों को गौर से देखियेगा तो आपको परेशानी होगी। भारतीय राजनीति में बहुत ही कम लोग बचे होंगे जो एक ही पार्टी में रहकर मर गए हों।अधिकतर गिरोहबाज लोग अपने लाभ के लिए उस हरेक गिरोह का परिक्रमा करने से बाज नहीं आते जहां उनकी उम्मीद बंधी होती है। आपको लगता है कि ऐसे गिरोहबाज का कोई जाति,धर्म,आचार,विचार और नैतिकता होती है? लेकिन लोकतंत्र के नाम पर सबकुछ चलता दिखता है और दिखता रहेगा।

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