भय और लोभ को परवान चढाती पटेलों की राजनीति 

0
53
गुजरात में विधानसभा चुनाव को लेकर अगर बीजेपी परेशान है तो कांग्रेस भी कम परेशान नहीं है। बीजेपी हांफ रही है तो कांग्रेस उलटी करती दिख रही है। पाटीदार समाज ने दोनों पार्टियों को नाथ रखा है। एक तरफ भय का वातावरण है तो दूसरी तरफ लोभ का। भय और लोभ के बीच परेशान बीजेपी और कांग्रेस से अलग पाटीदार समाज के लोग मुस्कुरा रहे हैं। पाटीदार समाज को पता है कि उसके वोट के बिना सत्ता की राजनीति संभव नहीं है।

ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि क्या इस बार भी पाटीदार लंबे समय से चली आ रही अपनी राजनैतिक परंपरा के अनुसार किसी एक दल को बहुमत देंगे या फिर इन चुनावों में समुदाय के वोट बंट भी सकते हैं।  लेकिन इससे पहले यह भी समझना होगा कि आखिर क्यों भाजपा और कांग्रेस किसी और जाति से कहीं ज्यादा ध्यान पाटीदारों को अपनी तरफ लुभाने या मनाने में लगाए हुए है।  यह भी कि कैसे किसी प्रदेश की आबादी का सिर्फ 14-15 फीसदी हिस्सा समेटे कोई भी समुदाय अकेले ही पूरे सूबे की राजनीति का वर्तमान और भविष्य दोनों को प्रभावित कर पाने में सक्षम हो सकता है।
गुजरात में पाटीदारों को पटेल या मुखी भी कहा जाता है क्योंकि सदियों से इस समुदाय के लोग  गांवों के मुखिया रहते आए हैं।  पटेल समुदाय मुख्यत: दो उपसमुदायों में बंटा हुआ है- कडुआ और लेऊआ।  जहां कडुआ पटेल उत्तर गुजरात में बहुतायात से मिलते हैं वहीं लेऊआ पटेलों की संख्या दक्षिण गुजरात में ज्यादा है। पाटीदारों की पकड़ प्रदेश के अधिकतर ग्रामीण इलाकों में आज भी इतनी मजबूत है कि अपने साथ बड़ी संख्या में दूसरे समुदायों के वोटों को भी किसी भी राजनैतिक दल के पाले में या उससे दूर ले जा सकते हैं। यहां यह भी बता देना जरुरी है कि  आंदोलन में न सिर्फ पटेल बल्कि बड़ी संख्या में दूसरी जातियों के लोग भी शामिल थे जिनमें ऊंची जातियों से ताल्लुक रखने वाले लोगों की संख्या सर्वाधिक थी।  प्रदेश के कई अन्य राजनीतिकार और पत्रकार भी इस बात का समर्थन करते हुए कहते हैं कि प्रदेश में पाटीदारों की अपनी संख्या भले ही 15 फीसदी हो, लेकिन उनका प्रभाव या दायरा सूबे की राजनीति में इससे कई गुना अधिक है। इसके कारण भी है।  पटेल समुदाय सबसे ज्यादा रोजगार भी पैदा करते हैं।  वह रोजगार चाहे कृषि क्षेत्र में हो या फिर व्यापार क्षेत्र में।  तय मानिये पटेल समुदाय जिधर वोट डालेंगे ,उनके साथ काम करने वाले कर्मचारी भी उधर ही वोट डालेंगे। बीजेपी को इसी का दर है।  बीजेपी जानती है कि अगर पटेल का वोट उनके पक्ष में नहीं गया तो उनके सहयोगी के वोट से भी उसे वंचित होना पडेगा।  इधर कांग्रेस को पटेल समुदाय के साथ आने से लाभ ही लाभ दिख रहा है।  लेकिन एक सच यह भी है कि  कांग्रेस से सदा छतीस का आंकड़ा रहा है।
1960 में गुजरात और महाराष्ट्र को अलग-अलग राज्य घोषित किया गया तो सूबे में पटेलों का जातिगत अनुपात भी कई गुना बढ़ गया और उनकी शक्ति भी। फिरराजनीतिये हुयी कि पटेलों ने जिसको वोट दिया उसकी जीत हुयी और अधिकतर पटेल मुख्यमंत्री ही बने। नरेंद्र मोदी भले ही पटेल नहीं रहे हों लेकिन पटेलों का पूरा समर्थन उन्हें मिलता रहा है। अभी पटेल समुदाय से 40 विधायक हैं।
आजादी के बाद के इतिहास को खंगाले तो सच यही है कि पटेल पहले कांग्रेस के साथ रहे। लेकिन जब 1980 में गुजरात में माधव सिंह सोलंकी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार सत्ता में आई तो उसने पटेलों को दरकिनार करना शुरू कर दिया।  बताते चलें कि माधव सिंह वर्तमान कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष भरतसिंह सोलंकी के पिता और कांग्रेस के दिग्गज नेता थे। जानकारों बताते हैं कि प्रदेश के तत्कालीन राजनैतिक हालात देखते हुए माधव सिंह सोलंकी ने 1981 में बक्शी आयोग की सिफारिश पर 86 जातियों को ओबीसी में शामिल करने का फैसला करते हुए ‘खाम’ (केएचएएम) सिद्धांत दिया।  इसमें ‘के’ का मतलब क्षत्रियों से था, ‘एच’ का हरिजनों से, ‘ए’ यानी आदिवासी और ‘एम’ मुसलमान।  पटेलों को इससे बाहर रखा गया। कांग्रेस पाटीदारों से अपने नाते को पूरी तरह से तोड़ चुकी थी और बची-कुची कसर सोलंकी ने अपने मंत्रिमंडल में किसी पटेल नेता को शामिल न करके पूरी कर दी।  पटेल आंदोलन पर उतर  गए।  कई लोग मारे भी गए लेकिन माधव सिंह सोलंकी को खाम समीकरण के कारण 1985 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस माधव सिंह के नेतृत्व में रिकॉर्ड 149 सीटों के साथ प्रदेश की सत्ता में वापस लौटी थी।  सत्ता में आने के बाद माधव सिंह सोलंकी ने सार्वजनिक मंचों से पाटीदारों के खिलाफ ऐसी कई बातें कहीं जिन्होंने समुदाय में भयंकर आक्रोश भर दिया।  नाराज पटेल राज्यव्यापी आंदोलन पर उतर आए जिसमें 100 से ज्यादा लोग मारे गए।फिर क्या था पाटीदारों का मन हमेशा के लिए कांग्रेस से खट्टा हो गया।
यही वह दौर था जब भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व का एजेंडा लेकर प्रदेश सहित देश भर में अपनी जगह तलाश रही थी।  विशेषज्ञ बताते हैं कि उस समय आक्रोशित पटेलों का एक समूह कांग्रेस से बगावत कर चुके चिमनभाई पटेल के साथ हो गया जबकि समुदाय के दूसरे समूह के नेतृत्व में प्रदेश की अधिकतर अगड़ी जातियों ने भाजपा को अपना समर्थन दे दिया।  इसके चलते 1990 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा और गुजरात में चिमनभाई के नेतृत्व में जनता दल- भाजपा के गठबंधन वाली नई सरकार बनी।  तब से पटेलों ने पलटकर कांग्रेस की तरफ नहीं देखा।  यह बात और है कि चिमन भाई बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए लेकिन तब तक पटेल केशु भाई को अपना नेता मान चुके थे। नतीजा ये हुआ कि 1995 के गुजरात विधानसभा चुनावों में केशुभाई के नेतृत्व में भाजपा भारी बहुमत के साथ सत्ता में इस कदर आई कि 22 साल से लगातार उस पर काबिज है।
लेकिन इस बार पटक साफ़ तौर से बीजेपी के खिलाफ खड़े हैं। वे कांग्रेस की तरफ जाते तो दिख रहे हैं लेकिन अपना पत्ता नहीं खोल रहे। कांग्रेस ,पटेलों की सभी मांगे मानने को तैयार है और सीट देने पर भी हामी भरी है लेकिन पटेलों का एक वर्ग आज भी कांग्रेस से दुरी बना कर चल रहा है। कंग्रेस की चिंता यही है। बूढ़े पटेल लोगों का समर्पण आज भी बीजेपी के साथ देखा जा रहा है।  ये वे लोग हैं जो 80 के दशक में कांग्रेस विरोध की राजनीति कर रहे थे। इन्हे कांग्रेस के साथ जाना अपमान जैसा लग रहा है।  लेकिन समय बदला तो आज के पटेल युवा बीजेपी के खिलाफ खड़े हैं।  संभव है कि पटेलों की युवा इकाई कांग्रेस के साथ खड़ी हो जाए और बूढ़े बुजुर्ग बीजेपी को वोट दे।  अगर ऐसा होता है तो बीजेपी को बहुत ज्यादा परेशानी नहीं होगी सरकार बनाने में। .

loading...

अखिलेश अखिल

loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here