राहुल के बढ़ते कदम, हर कदम पर कांग्रेस हुई बुलंद

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रितेश सिन्हा। राहुल गांधी के उपाध्यक्ष से अध्यक्ष बनने का रास्ता अब अंतिम पड़ाव में है। राहुल की राह आसान नहीं थी। उनको इस पद तक पहुंचने में 15 सालों से अधिक का वक्त लगा। पहले महासचिव, फिर उपाध्यक्ष और अब अध्यक्ष बनने की जद्दोजहद के बाद राहुल कांग्रेस के अध्यक्ष बनेंगे। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए राहुल ने खुद को साबित भी किया है। उनको बनाए जा रहे अध्यक्ष पद पर सिर्फ विरासती रवायत भर नहीं है, बल्कि राहुल ने कांग्रेसी नेता के रूप में पिछले साढ़े तीन वर्षों में देश में खुद को विपक्ष के नेता के तौर पर स्थापित किया है। राजनीति के दिग्गज लालू यादव, शरद यादव, शरद पवार, मुलायम सिंह यादव, ममता बनर्जी सहित देश की कम्यूनिस्ट पार्टियां जिस समय सत्ता पक्ष के प्रधानमंत्री की हुंकार के सामने बोलने का हौसला तक नहीं जुटा पा रही थी, वैसे में राहुल ने आगे बढ़कर भूमि अधिग्रहण बिल पर मोदी सरकार को अपनी आक्रामक विपक्ष की नेता की हैसियत से यू-टर्न लेने पर मजबूर कर दिया। पश्चिम यूपी के युवा जाट नेता बागपत के जितेंद्र सिंह कहते हैं कि युवाओं, छात्रों और देश के किसानों, व्यापारियों से मन की बात करने वाले प्रधानमंत्री खुद को देश का सर्वमान्य पीएम बता रहे हैं। राहुल ने दो सालांे के अंदर पीएम मोदी की लोकप्रियता का लावा ठंडा कर दिया। प्रधानमंत्री मोदी को उन्हीं के अंदाज में ललकार कर राहुल गांधी मन की बात कहने वाले पीएम को जन-जन की बातों को समझने पर मजबूर कर दिया।
गुजरात और हिमाचल के चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राहुल के प्रहारों से मानसिक संतुलन हिल सा गया है। विकास की बात करने वाले पीएम अब नाना-नानी पर उतर आए हैं। राहुल ने उनके पेटेंट मंदिरों में पहुंुचकर जिस तरीके से अपनी भावनाओं को सार्वजनिक किया है, उससे भाजपा में घबराहट और बौखलाहट साफ नजर आती है। मीडिया चैनलों में यही भाजपाई प्रवक्ता अब राहुल के मंदिर पालिटिक्स पर ही मोदी के विकास की परिभाषा को छोड़कर टिक गए हैं और मंदिर पर बहस में जुटे हैं। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने यहां तक कह डाला कि यूपी के निकाय चुनाव में राम मंदिर की वजह से जीत हासिल हुई है। ईवीएम मशीनों ने अगर उनका साथ दिया तो नतीजे चैकाने वाले होंगे। जहां-जहां बैलेट पर चुनाव हुए हैं, वहां भाजपा को मैदान छोड़ना पड़ा है। गुजरात में भी ईवीएम का चमत्कार मोदी को बचा पाएगा, मुश्किल लगता है। लेकिन मोदी सरकार की घबराहट साफ दिखाई देती है। उसके सभी केंद्रीय मंत्री जिला स्तर पर गुजरात चुनाव में भाजपा के पोलिंग एजेंट बने दिखाई देते हैं। देश भर से भाजपा की सरकारें गुजरात में साहेब को बचाने में जुटी हैं। ये तो चुनाव परिणाम बताएंगे लेकिन एक बात तय है कि राहुल गांधी ने निबटना आसान नहीं होगा। चुनौती और बढ़ेंगी, परिणाम जो भी हो।
कांग्रेस में इनके मित्र भी संकट में हैं। जो समय-समय पर मोदी की राह आसान बनाते रहे हैं। ऐसे लोगों को कांग्रेस में राहुल ने चिन्हित कर लिया है। मौका मिलते ही अहमद ब्रिगेड को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। अहमद कहां जाएंगे, ये वक्त बताएगा। पिछले चार-पांच महीनों में राहुल ने चुन-चुन कर अहमद के साथियों के सर और बाजू दोनों काटे हैं। जो बैरम खां की भूमिका निभा रहे थे, वो घूम-घूमकर वनवास काट रहे हैं। राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस अपने नए रूप में दिखाई देगी। जिन दलों के साथ कांग्रेस का गठबंधन है, उनकी शर्तें भी अब बदली जाएंगी। अहमद ने राजनीतिक सलाहकार रहते हुए कांग्रेस को समटने की रणनीति पर क्षेत्रीय दलों के साथ समझौते किए हुए थे। बिहार, झारखंड, यूपी में कांग्रेस एकला चलो की रणनीति पर काम करेगी। राहुल का प्रभावशाली नेतृत्व युवाओं को भा रहा है। गुजरात से आ रही राजनीतिक हवाएं बिहार, यूपी के नौजवानों को झकझोर रही है। हाल ही यूपी में संपन्न निकाय चुनावों में कांग्रेस ने बिना नेतृत्व के अच्छी बढ़त ली है। मथुरा से पार्टी ने बराबरी की लेकिन राजनीतिक पर्ची के खेल में मेयर पद से चूक गई। यहां आपको बता दें कि विधानसभा में कांग्रेस को केवल 30000 वोट मिले थे, लेकिन मथुरा से लोकसभा की तैयारी कर रहे श्याम सुंदर उपाध्याय के आक्रामक प्रचार और जबर्दस्त घेराबंदी ने भाजपा को रोक दिया। 80 हजार वोट कांग्रेस को दिलाने में वे सफल रहे। विधानसभा चुनावों में 30 हजार पाए कांग्रेसी प्रत्याशी प्रदीप माथुर सपा के गठबंधन के उम्मीदवार थे, लेकिन राहुल टीम में पहुंचे श्याम सुंदर पूरे मथुरा जिले में अपने पिछले नगरपालिका के चेयरमैन वाले कार्यकाल में किए गए कामों की वजह से आम जन में लोकप्रिय हो गए। आगामी लोकसभा चुनाव में श्याम सुंदर उपाध्याय कांग्रेस के उम्मीदवार होंगे, ऐसा कांग्रेस के नेताओं में चर्चा है।
राहुल की ताजपोशी के बाद कांग्रेस संगठन में श्याम सुंदर जैसे नेताओं पर उनकी सीधी नजर रहेगी। बिहार में भी कांग्रेस किसी तेजतर्रार, लालू और नीतीश दोनों के धुर विरोधी कांग्रेसी की तलाश में है, ऐसे किसी कांग्रेसी को नेपथ्य से निकालकर कमान देने की पूरी तैयारी कर चुकी है। देखना है कि राहुल की वर्किंग कमिटी में किस-किसको जगह मिलती है और कौन-कौन बाहर जाता है ? मोदी पर राहुल के आक्रामक तेवरों ने कांग्रेस के अंदर उनके प्रति उठ रही बगावती सुरों को दबा दिया है। उत्तराखंड में हरीश रावत परिवार का वर्चस्व भी टूटेगा। कमान किसको मिलेगी ये देखना अभी बाकी है। महाराष्ट्र में अशोक चव्हान का वनवास भी तय है। हालांकि अशोक अपने लोगों में ये भ्रम फैला रहे हैं कि गुजरात चुनाव का खर्चा उन्होंने उठाया है, वहीं पृथ्वीराज चव्हान हवा फैला रहे हैं कि राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस संगठन में वे खुद उपाध्यक्ष की भूमिका में रहेंगे। आपको बता दें कि ये वहीं पृथ्वीराव चव्हान हैं जिन्होंने राहुल की विभिन्न मौके पर उनको नासमझ भी कहा था और उनकी आलोचना भी की थी। जब राहुल गुजरात चुनाव में प्रचार कर रहे थे, जब जनआक्रोश रैली निकालकर प्रदेश भर में दोबारा अपने अध्यक्षीय पद के लिए अशोक चव्हान कांग्रेस हाईकमान पर दवाब बना रहे थे। छत्तीसगढ़ भी गुजरात की हवा से अछूता नहीं रहता। छग में रमण सिंह सरकार से जनता त्रस्त है, मौके की ताक में है कि कभी भी उनका ताज छिन सकता है। राहुल की नामिनेशन की तैयारियां पूरी है। राहुल सोमवार 4 दिसंबर को चार बजे के आसपास नामांकन का पर्चा भरेंगे। देर शाम में वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात करेंगे और 5 दिसंबर को वे पुनः गुजरात चुनाव के लिए उड़ जाएंगे। देश भर के कांग्रेसी मौसम की ठंड को नजरंदाज करते हुए दिल्ली पहुंचने की फिराक में है और राहुल के उपाध्यक्ष से अध्यक्ष बनने का जश्न 24 अकबर रोड पर अभूतपूर्व होने की उम्मीद है।
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