रितेश सिन्हा। बिहार में राजनीतिक घमासान जारी है। दुनिया को चाणक्य देने वाली इसी राजनीतिक भूमि से खुद को चाणक्य साबित करने की होड़ मची है। इसी बीच बिहार कांग्रेस की राजनीति रोचक मोड़ पर पहुंच गई है। कुछ दिनों पूर्व आलाकमान के पांव छूकर पार्टी में टिकट मांग कर अपनी राजनीतिक हैसिसत बढ़ाने वाले कुछ कांग्रेसी महागठबंधन के सहारे तो विधायक और विधानपरिषद् के सदस्य बन गए, आज वही कांग्रेसी ही कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के सामने ताल ठोक दी है। प्रभारी महासचिव सीपी जोशी पर तो टिकट बंटवारे के दौरान पैसे के लेन-देन के आरोप तक लगे थे जिसे उस समय कांग्रेस आलाकमान और बड़े नेताओं ने गंभीरता से नहीं लिया। केंद्रीय नेतृत्व से हुई यही बड़ी चूक, अब कांग्रेस उपाध्यक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रही है। राहुल के प्रचार-प्रसार से ये कांग्रेसी भले ही ओहदा पा चुके हों, मगर पाला बदलने को आतुर ये राजनीति के नए नौसिखिए खिलाड़ी भले की जुबानी जंग के जरिए खुद को तीसमारखां समझ बैठे हों, मगर आज भी जमीनी लड़ाई में बिना जमीन के नेता ही हैं जो किसी दूसरे की बैसाखी के सहारे ही आज तक राजनीति करते आए हैं। अशोक चौधरी खेमा सदानंद की अगुवाई में नीतीश की सरकार में घूसने के लिए इतने आतुर दिखते हैं कि पहले तो इन्होंने सिग्नेचर कैंपेन चलाया जिसकी हवा पहले ही निकल चुकी है। अब दो-तिहाई बहुमत न जुट पाने की कसक से आहत यही कांग्रेसी नेता पार्टी के उपाध्यक्ष से ही दो-दो हाथ की तैयार दिखते हैं। सदानंद दबे पांव तो अशोक फूफकार रहे हैं।
राहुल 14 दिनी विदेशी प्रवास के बाद दिल्ली लौट चुके हैं। अपने विदेश प्रवास के दौरान मोदी की प्रवासी राजनीति की काट उन्हीं की भाषा में दी। इसके राजनीतिक संदेश का आकलन भी कांग्रेस से अधिक भाजपा कर रही है। 2014 के बाद से जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी जबर्दस्त भाषण शैली से दुनिया भर में अपनी धूम मचाई। पीएम के संदेशों में विपक्षी पार्टियों की नीतियों की बखिया उधेड़ना और भाजपा की नीतियों का गुणगाण करना शामिल रहा। मगर कांग्रेसी युवराज ने जिस अंदाज में मोदी की नीतियों को विदेशी धरती से ताल ठोककर चुनौती दी है, उससे भाजपा खेमे में बेचैनी के सुर नजर आ रहे हैं। राहुल के भाषणों को देशी और विदेशी मीडिया में प्रमुखता मिली। भारत के कुछ खास प्रवृत्ति के मीडिया घरानों को छोड़कर बाकी सभी मीडिया में राहुल इस दौरान छाए रहे। विदेशी मीडिया की रिपोर्ट भी इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं कि राहुल की धीर और गंभीर छवि उभर कर आई है जिसमें मोदी को पलट देने की कुव्वत है, ऐसा संदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष ने अपने बयानों के जरिए भी दिखाया।
मगर राहुल की इस कामयाबी को धूल चटाने में बिहार के कांग्रेसी नेता जुट गए हैं। इन नेताओं ने राहुल के नेतृत्व को कमजोर नेतृत्व साबित करने की पुरजोर कोशिश की। आज कांग्रेस की स्थिति ऐसी हो गई है कि पार्टी का हर एमएलए, पार्षद प्रदेश अध्यक्ष पद पर अपने आप को फिट कर रहा है। यूं कहें कि सार्वजनिक तौर पर भी ये खुद को बिहार के अध्यक्ष मान बैठे हैं। ये वो कांग्रेसी हैं जिनकी निष्ठा पर पुराने और खांटी कांग्रेसी ने भी सवाल उठाए थे, लेकिन लेन-देन के खिलाड़ियों ने अपनी गोटी फिट कर इन खोटे सिक्कों को चलन में ला दिया। सीपी, सदानंद और अशोक की तिकड़ी ने ये टिकट निकाले थे जिसका खामियाजा आज कांग्रेस को भुगतना पड़ रहा है। ले-देकर टिकट पाने वाले गठबंधन की राजनीति में चुनाव तो जीत गए, अब रातोंरात सदाकत आश्रम की सूबेदारी और जागीरदारी हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
बिहार के प्रभारी महासचिव द्वारा अशोक चौधरी को मंत्री पद देकर, बिहार अध्यक्ष पर किसी दूसरे को नियुक्त न करना कोई राजनीतिक मजबूरी नहीं थी, बल्कि आर्थिक जरूरत ने डेढ़ साल से भी अधिक समय से बिहार को अध्यक्ष पद पर उलझाए रखा है। सीपी की होशियारी और कलाकारी का लब्बोलुआब है कि उनकी मंशा कभी भी बिहार में नए अध्यक्ष देने की नहीं रही। वो एक सधे हुए खिलाड़ी की तरह ऐसे नामों का सिक्का उछालते रहे जिसको आम कांग्रेसी किसी भी स्थिति में पसंद नहीं करता। ऐसे चेहरे सामने कर दिए जिससे आम कांग्रेसी भी स्वीकार नहीं कर सकते थे, इसलिए यथास्थिति बरकरार है। अगर कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की माने तो सीपी जोशी बिहार में नया अध्यक्ष नहीं चाहते, यह घुड़दौड़ राजस्थान के चुनाव तक जारी रखना चाहते हैं। मगर बिहार के ताजा घटनाक्रम ने उनके इस खेल को भी बिगाड़ दिया।
जो विधायक और मंत्री सरकार में खिचाई कर अपनी सिंचाई करने में लगे थे, गठबंधन की फूट से इस पर भी विराम लग गया और यही छटपटाहट वैसे विधायकों और पार्षदों की बेचैनी को बढ़ाए हुए है। अब इस पूरे एपिसोड में नया मोड़ आ चुका है। एक सुनियोजित षड्यंत्र के साथ यही लोग संपूर्ण पार्टी को हाईजैक कर सदाकत आश्रम को जदयू का आफिस बनाना चाहते हैं। सदानंद और अशोक की अगुवाई में कभी कांग्रेस की विशिष्ट पहचान रखने वाला सदाकत आश्रम अब अघोषित रूप से जदयू के कैंप कार्यालय की तरह काम कर रहा है। इसी सदाकत आश्रम से केंद्रीय नेतृत्व को चुनौती देना और मीडिया के माध्यम से जदयू प्रवक्ताओं द्वारा इन बयानवीरों की बयानबाजी को खुले दिल से स्वीकार करना इस राजनीतिक लड़ाई की स्पष्ट दिशा को बयां करती है।
नीतीश पर साख का संकट है। मोदी और शाह के बुने जाल में वे ऐसे फंसे हुए हैं जिससे निकल पाना अब आसान नहीं। रणनीतिकारों की माने तो 2019 के चुनाव के पूर्व नीतीश कुमार पर कानूनी शिकंजा कसेगा और सूबे में राष्ट्रपति शासन लगाकर नीतीश की राजनीतिक अस्तित्व पर विराम लगाने के लिए घेराबंदी की जा रही है जिसमें वे बुरी तरह फंस भी चुके हैं। वर्तमान समय में जदयू और भाजपा के सहयोग से चल रही सरकार पूर्ण बहुमत में है। मगर जिस प्रकार से शरद यादव ने जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष की राजनीति में सेंधमारी कर दी है, इससे पार्टी को टूट से अब कोई नहीं रोक सकता। नीतीश शरद की ताकत को पहचानते हैं और उनकी सियासत को भी बखूबी जानते हैं।
नीतीश को छोड़कर जदयू के अधिकतर नेता वोट कटवा है न कि वोट जुटाऊ नेता। जमीनी नेताओं का अकाल और हवा-हवाई नेताओं की बाढ़ भी नीतीश के चिंता का सबब है। वे यह भी जानते हैं कि वर्तमान समय में उनको कांग्रेसी विधायकों की कोई जरूरत नहीं। मगर अगर कांग्रेस पार्टी ही टूट कर जदयू में शामिल हो जाए तो उनकी ताकत ही बढ़ेगी। नीतीश इस बात को भी बखूबी जानते हैं कि अगर उनकी यह कोशिश कामयाब नहीं होती है तो न तो उनकी सरकार बचेगी और न ही हैसियत। वे जी-जान से अशोक-सदानंद को ढाल बनाकर ज्यादा से ज्यादा कांग्रेसियों को तोड़ने में इसिलिए लगे हैं कि अगर उनके सबसे बड़े विरोधी शरद अगर जदयू को तोड़ने में कामयाब होते हैं जो जदयू की सबसे बड़ी टूट होगी, वैसे हालात में यही कांग्रेसी उनके लिए सबसे बड़े राजनीतिक हथियार साबित होंगे। यही वजह है कि नीकु ने अपने सिपासलारों संजय सिंह और नीरज कुमार को बगावती कांग्रेसियों के हर बयान का स्वागत करने के काम में लगा दिया है ताकि 1 अण्णे मार्ग के साथ-साथ सदाकत आश्रम पर भी इस तिकड़ी की मदद से हुकुमत कायम रह सके।
जिस प्रकार से कांग्रेस के ये बागी नीतीश मंत्रीमंडल के मंत्रियों के तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हैं, वो भी आम कांग्रेसियों में गुस्से का सबब है। वहीं जदयू भी ऐसे कांग्रेसियों के लिए बांहें फैलाए खड़ी दिखती है यही वजह है कि पार्टी ने कांग्रेसी विधायकों को जदयू में शामिल होने का खुला निमंत्रण दिया है।
अशोक और सदानंद खेमे की बयानबाजी केवल आलाकमान को उसकाने और चिढ़ाने के लिए है ताकि वे उनको पार्टी से निष्कासित करें और उनकी सदस्यता बची रहे। ऐसा होने पर ये नेता जदयू में शहीद का दर्जा लेते हुए नीतीश की वफादारी का पूरा इनाम वसूल सकें। बयानवीरों की यह तिकड़ी इस रणनीति में कामयाब होती भी दिख रही है। इसके लिए सुनियोजित तरीके से पटना में मीडिया मैनेज कर ये खबर प्लांट कराई गई थी कि राहुल गांधी इस तिकड़ी के खिलाफ कुछ घोषणा करेंगे, मगर कांग्रेस उपाध्यक्ष ने संयम दिखाते हुए उन्हें खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज पर म्यान में सिमटने को मजबूर किया हुआ है। उन्होंने मामले की गंभीरता को आकलन करते हुए गुजरात दौरे के बाद संभवतः इस मसले पर कोई फैसला लेंगे। जितना संयम राहुल बरतेंगे, उतना असंयमित इन बागी नेताओं का आचरण होगा। ऐसे में नीतीश के ‘मिशन कांग्रेस‘ को तगड़ा झटका लग सकता है, साथ ही कांग्रेस के इन अवसरवादी नेताओं के मंसूबे पर भी पानी फिरना तय है।
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