रितेश सिन्हा। बिहार के सदाकत आश्रम में बवाल से पार्टी के कई दिग्गज संदेह के घेरे में हैं। प्रदेश कार्यालय में कांग्रेसी परंपरा की धज्जियां उडाई गई, उसकी मिसाल ढूंढे नहीं मिलेग़ी। बिहार के डेलीगेट्स के लिए बुलाई गई बैठक में बवाल की रूपरेखा उसी दिन तय हो चुकी थी जब पूर्व मंत्री अशोक चौधरी को प्रभारी महासचिव सीपी जोशी ने पार्टी हाईकमान को गुमराह करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री अखिलेश प्रसाद सिंह का नारा लगाने वाले कौकब कादरी को सूबे का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया। इसकी पृष्ठभूमि कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय स्थित सीपी जोशी के कमरे में तैयार की गई। ये सारा खेल उस दिन हुआ जब 10 जनपथ से सीपी को किसी वरिष्ठ उपाध्यक्ष को बिहार कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के लिए कहा गया था। सीपी के कमरे में 5-8 बजे तक रोज दरबारी बने अखिलेश सिंह प्रभारी महासचिव के जरिए अपने झंडाबरदार और प्रदेश के उपाध्यक्ष कौकब कादरी को कार्यकारी अध्यक्ष बनवाने में कामयाब रहे। फिर क्या था, कादरी सदाकत आश्रम में अपनी जड़ें जमाने लगे और दिल्ली में बैठे अपने राजनीतिक आका के निर्देश पर प्रदेश कांग्रेस को छेड़ना शुरू किया। सीपी जोशी और प्रदेश के पीआरओ प्रदीप भट्टाचार्य के साथ मिलकर उन्होंने डीआरओ द्वारा निर्वाचित किए गए डेलीगेट्स को बदलने का काम शुरू किया जिसमें चुन-चुनकर अशोक समर्थक नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया गया।
कांग्रेस डेलीगेट्स के लिए बुलाए गए प्रेस कांफ्रेंस का नजारा बदला हुआ था। कार्यकारी अध्यक्ष बने कादरी ने बकायदा आमंत्रित करके प्रेस वार्त्ता का आयोजन किया था, मगर वहां उनके उस्ताद और माई-बाप बने अखिलेश कौकब के साथ बैठे नजर आए। उसके बाद उन्होंने पत्रकारों को निर्देश देना प्रारंभ किया। इस पर वहां बैठे एक संवाददाता ने जब पूर्व केंद्रीय मंत्री से यह पूछा कि आप कौन हैं, यह संवाददाता सम्मेलन तो कादरी ने बुलाई है। इतना सुनते ही अखिलेश पूरी तरह से भड़क गए। विवाद बढ़ता देख शागिर्द कौकब ने उस्ताद अखिलेश के हाथों से माइक छीन लिया पर उस्ताद की अकड़ नहीं गई। किसी तरह से औरंगाबाद के मृदुभाषी युवा नेता कादरी पत्रकारों से हाथ जोड़कर उन्हें मनाने में कामयाब रहे। सम्मेलन के दौरान गुरू और चेले के बीच तनातनी साफ दिखी। अगले दिन सुबह आहुत की गई डेलीगेट्स की मीटिंग जब शुरू हुई तो वहां भी अखिलेश प्रदेश कांग्रेस पर अपना रंग जमाने के लिहाज से पूरे रौ में नजर आए। उनके साथ कुछ ऐसे लोग भी दिखे जिनका न तो प्रदेश और न ही कांग्रेस से ही नाता रहा है। ये इंतजाम अशोक से दो-दो हाथ करने का था।
शह और मात के इस खेल में अशोक चौधरी भी पूरी तैयारी के साथ आए थे। उनके साथ कई विधायक और एमएलसी भी आए। विधायकों में अमिता भूषण, मुन्ना तिवारी और एमएलसी दिलीप चौधरी, प्रदेश के कई पदाधिकारियों के अलावा कुछ रंगबाज टाइप छुटभैये नेता भी अशोक खेमे में नजर आए। पटना की राजनीति को वर्षोें से देखते आए अशोक भी पूरे इंतजाम के साथ पहुंचे थे। प्रदेश कार्यालय में पहले से सुनियोजित योजनाबद्ध तरीके से उनको अकेले अंदर जाने की इजाजत दी गई, लेकिन सदाकत आश्रम में 700-800 लोगों की भीड़ में अकेले अशोक को जाने की इजाजत से उनके साथ आए समर्थक बेहद नाराज थे। अशोक समर्थकों ने जमकर नारेबाजी की और कार्यालय में घूसने में कामयाब रहे। अपने साथियों के साथ हुए बुरे बर्ताव से तमतमाए अशोक चौधरी ने कौकब कादरी की कॉलर पकड़ कर जमकर क्लास ली। उसके बाद तो अखिलेश और अशोक समर्थकों के बीच जमकर गाली-गलौच और लात-घूसे चले। इस सुनियोजित बंदोबस्त को देखकर प्रदेश के अन्य दावेदारों ने सदाकत आश्रम में जाने से कन्नी काटने में ही भलाई समझी। इस भिडं़त के दौरान मोदी जिंदाबाद के नारे में लगे।
इसी क्रम में प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए मजबूत दावेदार बनकर उभरे पुराने खांटी कांग्रेसी श्याम सुंदर सिंह ‘धीरज‘ भी समर्थकों के साथ सदाकत आश्रम पहुंचे। उनके पहुंचते ही सोनिया-राहुल गांधी जिंदाबाद के नारे लगने लगे। मामला किसी तरह बीचबचाव से छूटा और अशोक अपने समर्थकों के साथ वहां से धीरे से निकल लिए। धीरज ने पीआरओ प्रदीप भट्टाचार्य के कहने पर कांग्रेसियों को संबोधित भी किया साथ ही उन्हें चेताते हुए कहा कि इस तरह की गतिविधि न तो कांग्रेस में न ही सदाकत आश्रम में पहले हुई है। ये अत्यंत शर्मनाक है। आपको बता दें कि कांग्रेस के दिग्गज सीताराम केसरी के शिष्य माने जाने वाले श्याम सुंदर सिंह ‘धीरज‘ ने अपने ही राजनीतिक गुरू के खिलाफ उस समय विद्रोह कर दिया था, जब सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाए जाने की केशरी खिलाफत कर रहे थे। उसी विरोध की वजह से धीरज को केशरी खेमे ने हाशिए पर धकेल दिया लेकिन गांधी परिवार के करीबी होने की वजह से 10 जनपथ के सूत्रों ने उन्हें एआईसीसी में सक्रिय रहने को कहा। 77-80 में कांग्रेस के लिए संघर्ष करने वाले धीरज उसी चिरपरिचित अंदाज में दम-खम के साथ सदाकत आश्रम में नजर आए। इस बवाल के दौरान भी प्रदेश कांग्रेस के नए नेताओं ने उनके उसी पुराने जलवे का दीदार भी किया। जब बवाल शांत हुआ तो सीएलपी लीडर सदानंद सिंह के प्रस्ताव का मदन मोहन झा ने अनुमोदन किया और सभा समाप्त हो गई। इस घटना के तुरंत बाद अशोक चौधरी ने अपने समर्थकों के साथ हुए दुर्व्यवहार की रिपोर्ट पाटलीपुत्र थाने में दर्ज कराई। आपको बताते चलें कि विवाद की असली वजह डेलीगेट्स की सूची में गड़बड़झाला का होना है। अशोक चौधरी ने प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौकब कादरी और पीआरओ प्रदीप भट्टाचार्य से डेलीगेट्स की सूची सार्वजनिक करने को कहा तो उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। दिल्ली स्थित पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में कांग्रेस चुनाव प्राधिकरण के सदस्य मधुसूदन मिस्त्री जो बिहार के संगठन चुनाव को भी देख रहे हैं, का कहना है कि बिहार की सूची अभी तक जारी नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब डेलीगेट्स की सूची ही नहीं बनी तो फिर किन-किन लोगों को बुलाकर सदाकत आश्रम में मीटिंग ली गई। प्रथम दृष्टया में यह फर्जीवाड़ा ही लगता है। ऐसे में जो प्रस्ताव बैठक में पारित किए गए, वो बेमानी है।
सदाकत आश्रम में कुर्ता फाड़ सम्मेलन के बाद पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चौधरी ने संवाददाता सम्मेलन आयोजित कर कहा कि मुझे पहले से अंदेशा था कि ऐसी घटना होगी। कौकब कादरी सिर्फ मोहरा भर हैं, असली खेल तो पर्दे के पीछे से बिहार के प्रभारी महासचिव सीपी जोशी खेल रहे हैं। चौधरी के मुताबिक जोशी कांग्रेस को अपनी जेब में रखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि बाहरी तत्व को बुलाकर गुंदागर्दी कराई गई और मुझे यह भी पता है कि संगठन चुनाव में जमकर धांधली हुई है। मैंने राहुल गांधी को सारी बातें एसएमएस कर बता दी है। धक्कामुक्की की घटना की जांच कमिटी पर तंज कसते हुए अशोक चौधरी ने कहा कि जिस पूर्व एमएलसी ज्योति के आचरण की जांच विधान परिषद् की कमिटी कर रही है, अब वह मेरी भी जांच करेगी। इस सम्मेलन में विधायक आनंद शंकर, संजय तिवारी, एमएलसी तनवीर अख्तर, रामचंद्र भारती और दिलीप चौधरी भी मौजूद रहे। वहीं अशोक समर्थकों का कहना है कि दिल्ली में बैठे मिस्त्री और जोशी दोनों ही नेता राहुल गांधी की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहे हैं।
देखा जाए तो कांग्रेस के इस टूट और विधायकों की बगावत के पीछे दिल्ली से भी सियासत जमकर हो रही है जिसमें जाति-विशेष के विधायकों को पार्टी छोड़ने के निर्देश भी दिए जा रहे हैं। पार्टी के नाम के महासचिव और पार्टी उपाध्यक्ष द्वारा हाशिए पर डाल दिए गए दिग्विजय सिंह की भूमिका को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसा मानने वालों में 80 के दशक में कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह के करीबी रहे ए.के. सिंह भी हैं। उनका कहना है कि दिग्विजय भी इस खुले खेल में शामिल हैं, मगर पर्दे के पीछे से। केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण के अध्यक्ष मुलापलि रामचंद्रन ने सदाकत आश्रम के इस बवाल पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि बिना तैयारी के मीटिंग गलत है। देखा जाए तो अगर डेलीगेट्स के नाम की घोषणा पहले हो गई होती तो शायद यह बवाल नहीं होता। उधर अखिलेश की देखरेख में प्रदेश कमिटी में मीटिंग और उनके प्रेस वार्ता में संबोधन से कांग्रेसी बेहद आहत हैं। इन नेताओं का कहना है कि अखिलेश न तो प्रभारी हैं, न ही संगठन चुनाव का काम देख रहे हैं, न विधायक हैं, न ही किसी पद पर है तो फिर किस हैसियत से डेलीगेट्स मीटिंग में शामिल हुए। जिस प्रकार से अखिलेश पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष का इस्तेमाल अपने विरोधियों को निबटाने के लिए कर रहे हैं, उस पर कई केंद्रीय नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
नाम न छापने के शर्त पर इन्होंने बताया कि एक तो संगठन चुनाव चल रहे हैं, दूसरा गुजरात और हिमाचल में होने वाले चुनाव को देखते हुए पार्टी में कोई गलत संदेश न जाए, इसलिए बयान देने से बच रहे हैं। उधर कुछ नेताओं ने बिहार की दूसरी राजनीति की तरफ भी इशारों में तंज कसा है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के जन्मदिवस के मौके पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में लालू प्रसाद यादव को मुख्य अतिथि बनाया गया है। इसके पीछे राजनीति यह है कि अखिलेश राजद सुप्रीमो के कांग्रेस में संपर्क का सहारा लेकर अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज होने का सपना पाले हैं, हड़बड़ी में इस प्रकार की सियासत से उनकी राजनीतिक जमीन नेपथ्य में जा सकता है। उन्होंने एक बयान भी दिया है कि कांग्रेस ने श्रीकृष्ण बाबू को भारत रत्न नहीं दिया, ऐसा कहकर उन्होंने कांग्रेस को ही कठघरे में खड़ा करने का कोशिश की है। इस बयान ने भी कांग्रेस में उनके आगे बढ़ने पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। गांधी परिवार के करीबी लोगों की माने तो धीरज की अचानक बढ़ी इस सक्रियता से कांग्रेस का एक खेमा बड़ा बेचैन है। बिहार में जमीन तलाश रही कांग्रेस को कादरी चलाएंगे या फिर और इसका निर्णय तो कांग्रेस आलाकमान लेगी, मगर 10 जनपथ के करीबी लोगों का कहना है कि बिहार मामले में सीपी और उनके दरबारी नेताओं से खासा नाराज है। सूत्रों की माने तो प्रदेश अध्यक्ष के साथ-साथ नया प्रभारी का मिलना भी तय है। लब्बोलुआब है कि जिस प्रकार सदाकत आश्रम कांग्रेसियों का दंगल बना, जिस प्रकार बयानवीर के शब्दभेदी वाण चले, उससे तो एक बात स्पष्ट है कि सीपी बिहार में एक खलनायक के तौर पर उभरे हैं। वहीं मिस्त्री की संगठन मामलों में अनुभवहीनता और जोशी की व्यक्ति विशेष के लिए समर्थन ही कांग्रेस की इस बदहाली का प्रमुख कारण है।
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