रितेश सिन्हा। मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ जिस तरीके से राहुल ने संसद से सड़क तक समूचे विपक्ष को एकजुट करने का काम किया है, उससे कांग्रेसी खेमे तो उत्साह का माहौल है, मगर भाजपा खेमे में बेचैनी साफ नजर आ रही है। राहुल की शैली ने भाजपा को भी नई रणनीति बनाने पर मजबूर किया है। 2014 के पूर्व लगातार दस वर्षों तक यूपीए सत्ता में तो थी मगर राहुल खुद को उभारने में सफल नहीं हो पाए। कारण इनकी अपनी पार्टी की सरकार की अगुवाई डा‐ मनमोहन सिंह कर रहे थे। राहुल कई बार अपनी ही सरकार की नीतियों से असहमत दिखे। भ्रष्टाचार के मामले में मनमोहन सिंह द्वारा संसद में पेश किए गए बिल को चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने फाड़ते हुए डस्टबीन में डाल दिया था। उस समय भी उनकी इस नई सोच को कांग्रेस में नकारात्मक दृष्टिकोण से देखा गया था, लेकिन न तो राहुल ने अपने तेवर बदले, न ही सोच। अलबत्ता मिस्टर क्लीन मनमोहन सिंह के सामने यह छाप छोड़ने में जरूर सफल रहे कि वे अपनी ही सरकार की गलत नीतियों का विरोध करेंगे। ये वही राहुल थे जो न तो सरकार में अगुवा थे और न ही कांग्रेस में ही उनकी धमक थी। उन्हें तो वरिष्ठ कांग्रेसियों ने महज यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई का प्रभार देकर एक तरह से हाशिए पर डाला हुआ था।
यूपीए के जाते ही जब भाजपा का विजय रथ चला तो राहुल गांधी ने खुद को विपक्ष के नेता की जिम्मेदारी निभाते हुए देशभर में भ्रमण किया। जहां मोदी अपनी पहचान विदेशों में बना रहे थे, वहीं राहुल देश में जुमलों की सच्चाई से किसानों, युवाओं और देश के आम आदमी को मोदी सरकार और उनके जुमलेबाज अध्यक्ष अमित शाह की पोल खोल अभियान चला रहे थे। राहुल की इस मेहनत का असर आमजन, युवा, किसानों और छात्रों का जबर्दस्त समर्थन हासिल हो रहा है जिसका परिणाम है कि आज मोदी सरकार हर मसले पर यू-टर्न लेने पर मजबूर है। आज के कांग्रेसी उन्हें अपना निर्विवाद नेता मानते हैं। नेता के तौर पर उनका यह प्रयास रंग लाया। कांग्रेस में युवराज के नाम से पहचाने जाने वाले इस युवा तुर्क ने अपने उसी तेवर के साथ मोदी सरकार की नीतियों की धज्जियां उड़ाते हुए उन्हें बैकफुट पर ला खड़ा किया। किसानों की बढ़ती आत्महत्या का मामला हो या फिर युवाओं के रोजगार का मसला, बेरोजगारी कम करने की बात हो या जनहित से जुड़े मसले या फिर ऐसे मुद्दे जिसे उठाकर नरेंद्र मोदी सरकार में आए थे, उन्हीं मुद्दों पर ही राहुल की घेराबंदी ने भाजपा के लिए मुसीबतें जरूर खड़ी कर दी है। कांग्रेस उपाध्यक्ष का मानना है कि साढ़े तीन वर्षों में मोदी सरकार ने कई योजनाओं की घोषणा की, मगर अधिकतर घोषणाएं महज चुनावी भाषण बनकर रह गई और आम जन के लिए छलावा ही साबित हुई। स्वच्छता अभियान को जोर-शोर से चलाने वाले पीएम का प्रचार तंत्र तो हर जगह दिखता है, मगर धरातलीय स्थिति तो कुछ और ही बयां करते हैं।
राहुल के तमाम प्रयासों को उन्हीं के सिपाहसलार ही पलीता लगाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इसकी शुरूआत खुद को राहुल का स्वयंभू सलाहकार बताने वाले दिग्विजय सिंह ने की। उन्होंने जिस तरीके से बहुसंख्यक हिन्दू समाज को योजनाबद्ध तरीके से कांग्रेेस से दूर करने में महती भूमिका निभाई, वो अब किसी से छिपी नहीं है। गोवा की हार के बाद जब राहुल ने दिग्गी के पर कतरे तो अपने भाई लक्ष्मण सिंह के कंधे पर बंदूक रखकर कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को ललकारा था, उसे राहुल अब तक नहीं भूले हैं। यही वजह है कि अब कांग्रेस मुख्यालय में केवल उनके नाम की तख्ती बाकी है। उनकी तख्ती पर एक और तख्ती अशोक गहलोत के नाम की लग चुकी है जो गुजरात के प्रभारी बनाए गए हैं। मगर दिग्गी जैसे लोग आसानी से कहां हार मानने वाले। अपना दम दिखाने के लिए दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में अपने चहेतों के जरिए एक सम्मेलन भी बुलाया, मगर उनके समर्थकों ने भी उनसे किनारा करने में भलाई समझी। राजनीति में दिग्गी राजा से पिद्दी बन चुके नाम के ये महासचिव अपने ही सूबे में पदयात्रा करने को विवश हैं। राहुल के ये स्वयंभू सलाहकार पदयात्रा के जरिए अपनी साख बचाने की कोशिश में जुटे हैं।
दिग्विजय का कद छोटा करने के साथ-साथ आरपीएन सिंह और अविनाश पांडे जैसे नेताओं को कांग्रेस में अहम जिम्मेदारी देकर राहुल पार्टी को सींचने में लगे, मगर मधुसूदन मिस्त्री जैसे गैर-राजनीतिक सिपाहसलार कांग्रेस की जड़ें खोदने में लगे हैं। अहमद पटेल की कृपाप्राप्त मिस्त्री चुनाव प्राधिकरण के सदस्य मात्र हैं, मगर प्राधिकरण के अध्यक्ष व अन्य सदस्यों को धत्ता बताकर सीईसी के दफ्तर पर ही कब्जा जमाए बैठे हैं। ‘भाई‘ के वरदहस्त मिस्त्री कांग्रेस की बुलंद इमारत की एक-एक ईंट खींच लेना चाहते हैं। देश भर से मिलने आ रहे वरिष्ठ कांग्रेसी एवं आम कार्यकर्त्ता की माने तो वे बेढंगे ढंग से अपमानित करते हैं। ये नजारा रोज का है। ऐसा नहीं है कि संगठन में इसकी जानकारी लोगों को नहीं है। मोतीलाल वोरा जैसे वरिष्ठ नेता भी उनके कोप का भाजन बन चुके हैं। आम कांग्रेसी नेताओं का यहां तक कहना है कि ऐसा कांग्रेस के इतिहास में पहली बार हो रहा है कि संगठन चुनाव के बहाने जिला अध्यक्ष, शहर अध्यक्ष और एआईसीसी डेलीगेट्स बनाने के लिए मोटी रकम वसूली जा रही है। इन नेताओं की माने तो पीआरओ के माध्यम से मधुसूदन मिस्त्री अपने केंद्रीय कार्यालय में ही नाम तय कर देते हैं। अमूक को डेलीगेट्स बनाओ, अमूक को जिला अध्यक्ष या फिर शहर अध्यक्ष की पूरी लिस्ट खुद तय करके पीआरओ को सूचित करते हैं। पीआरओ भी उनके इस खेल में शामिल हैं और जो पीआरओ उनकी इस विशेष मंडली में नहीं हैं, उनको मिस्त्री बकायदा फोन करके ऊपर का आदेश कहकर फैसला मानने को बाध्य करते हैं। ये ऊपर का आदेश किसका है, जब इसकी खोजबीन की गई तो मामला तो कुछ और ही निकला। कांग्रेस में जो ऊपर से आदेश बताया जाता है, वह न तो कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी का है और न ही पार्टी उपाध्यक्ष राहुल का। मिस्त्री को नजदीक से जानने वाले इस ऊपर वाले शब्द के साथ उस ‘भाई‘ को भी बखूबी जानते हैं।
बात निकली है तो दूर तलक जाएगी! मधुसूदन मिस्त्री की बदतमीजी और गुस्ताखियों की कहानियां सबकी जुबान पर है। पार्टी महासचिव के बंद कमरों से लेकर एआईसीसी के खुले मैदान में या फिर कैंटीन में, हर जगह उनकी घिनौने कारनामों की खुली चर्चाएं होती हैं। अपने इसी व्यवहार की वजह से उनको अपने पोस्टर लगाने के लिए बिजली के खंभे पर चढ़ना पड़ा था। महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड सहित कई प्रदेशों के विधायकों ने बातचीत में कहा कि डेलीगेट्स की बोली लगती है। कुछ विधायकों व स्थानीय नेताओं ने इसका सार्वजनिक रूप से विरोध भी किया तो कईयों ने लिखित शिकायत तक की। मगर इनकी फरियाद अभी तक कांग्रेस उपाध्यक्ष तक नहीं पहुंची है। कई तो कांग्रेस मुख्यालय में महासचिवों के कमरों में जाकर गुहार भी लगा चुके हैं मगर इस पर सुनवाई तो दूर, सभी अपना दामन बचाने में जुटे हुए हैं। ऐसे में सबकी आस कांग्रेस आलाकमान पर टिकी हुई है।
गुजरात चुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए बेहद अहम है। कांग्रेस के लिए करो या मरो वाली स्थिति है, मगर मिस्त्री सरीखे नेता प्रदेश की बजाए अपना अधिकतर समय कंेद्रीय कार्यालय में कांग्रेस के वरिष्ठ और अपने क्षेत्रों में मजबूती के साथ डटे नेताओं को अपमानित कर रहे हैं। कभी संगठन में नहीं रहे मिस्त्री आज कांग्रेस संगठन बनाने की बजाए उसे ढहाने का काम कर रहे हैं। इसी से पता चलता है कि वे कितने गंभीर हैं। भाई के ये सिपाही अगर ऐसी ही बदतमीजी करते रहे तो 44 कांग्रेसी सांसद को 4 पर ला खड़ा कर देंगे। कांग्रेस के सरदार बनने जा रहे राहुल मिस्त्री को वहां से हटाएंगे या पार्टी को बर्बाद करने वाले भाई के सिपाहसलार को कोई और जिम्मेदारी देंगे। लेकिन अगर कार्यकर्त्ताओं के आक्रोश पर अगर गंभीरता से नहीं लिया गया तो मिस्त्री की सार्वजनिक रूप से आम कांग्रेसी कोप के भाजन बन सकते हैं। अभी पीसीसी डेलीगेट्स की घोषणा के बाद कई चीजें बाकी हैं, लेकिन इतना तो मिस्त्री ने अपने व्यवहार से कर लिया है कि उनके साथ सार्वजनिक रूप से दुर्व्यवहार हो सकता है। इसकी शुरूआत कौन करता है और ये रस्म कहां पूरी होगी, ये तो आने वाला वक्त की बताएगा।
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