दागी नेता, राजनैतिक चरित्र और प्रशासनिक कर्मकांड

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@ तीखी बात/कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार।

जो राजनेता संसद व विधानमंडल में मनमाफिक वेतन बढ़वा लेते हैं, उनकी सरकार जब सुप्रीम कोर्ट में यह कहे कि उनके पास ऐसी कोई एजेंसी नहीं है जो दोषी (दागी) नेताओं के आंकड़े एकत्र कर सके, तो यही सवाल उठता है कि विगत 70 सालों से आप कर क्या रहे थे? यही नहीं, जब वो यह थोथी दलील दे कि उसने इसके लिये चुनाव आयोग से कहा था जिसने ऐसे आंकड़े एकत्र करने से मना कर दिया, तो इसका मतलब यही है कि यह संवैधानिक संस्था भी दागी राजनीति का हलाहल पीने को यदि अभिशप्त है तो कहीं न कहीं इसकी राजनैतिक वजहें जरूर रही होंगी।

खैर, किसी भी सभ्य और जनहित के प्रति संवेदनशील समाज/सरकार के लिये यह तो जांच-पड़ताल का विषय है, लेकिन सुकून भरी बात यही है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों को निपटाने के लिये केंद्र सरकार ने 12 विशेष कोर्ट खोलने की योजना का खाका सुप्रीम कोर्ट में पेश किया है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। उम्मीद भी यही है कि न्यायिक सक्रियता के फलस्वरूप शीघ्र ही इसे अमलीजामा पहनाया जा सकेगा।

महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी अदालतों में सिर्फ नेताओं/जनप्रतिनिधियों से जुड़े आपराधिक मुकदमें ही सुने जाएंगे, जिनका निपटारा एक वर्ष के अंदर ही करना होगा। यही नहीं, दण्डित होने के बाद सम्बन्धित राजनेताओं की विधान सभा या लोकसभा की सदस्यता रद्द हो जाएगी। खास बात यह कि ऐसी अदालतों के फैसलों के खिलाफ अपील सिर्फ उच्च न्यायालय में ही की जा सकेगी। स्वाभाविक है कि इससे राजनेताओं की आपराधिक महत्वाकांक्षाएं हतोत्साहित होंगी, जिसकी मौजूदा राजनैतिक और सामाजिक परिवेश को सख्त जरूरत है।

कहना न होगा कि राजनीति कभी भी ‘बेदाग’ नहीं रही, न होती है। भले ही ‘शास्त्र’ और ‘शस्त्र’ उसके नियामक तत्व हों, लेकिन ‘छल-प्रपंच’ व ‘घात-प्रतिघात’ उसकी सबसे बड़ी थाती समझी जाती है! दरअसल, एक-दूसरे को शिकस्त देने का यह नायाब नुस्खा है, जो आदिम युग से चला आ रहा है। चाहे वैदिक कथाएं हों या रामायण/महाभारत, ऐसे दृष्टांतों से भरे पड़े हैं। यह बात दीगर है कि सत्य-असत्य की पड़ताल कोई भी समाज देश-काल-पात्र की परिस्थितियों के मुताबिक करता है, जिससे नैतिक संकट गहराया है।

यूं तो हमारी लोक गाथाओं में भी छल-प्रपंच, घात-प्रतिघात की आहट मिलती है, जो कि मानवीय दुष्प्रवृत्ति है जिससे कोई भी राजकाज अछूता नहीं बचता। चाहे राजतंत्र हो या बहुमत आधारित लोकतंत्र, दागी नेतृत्व और दोषपूर्ण राजनीति की शिनाख्त करना सदैव ही एक जटिल कार्य समझा गया। फिर भी, लोक इतिहास और लोक परम्परायें साक्षी हैं कि लोकसाहित्य, लोकसंस्कृति, लोकभाषा, लोककला, लोकगाथा और नुक्कड़ नाटकों में यह पीड़ा हर काल में झंकृत हुई, जिससे सम्बन्धित व्यक्ति/समूह को सार्वजनिक उपहास का पात्र भी बनना पड़ा। इसलिये दागी नेताओं अथवा दोषपूर्ण राजनीति के कायाकल्प के लिये यत्र-तत्र-सर्वत्र जो मुहिम छिड़ी है, उसके सार्थक परिणाम मिलेंगे, इस बात को लेकर हमें आश्वस्त रहना चाहिये और स्थिति परिस्थिति में बदलाव के लिये अपने हिस्से की पहल अवश्य करनी चाहिये।

कहा भी जाता है कि ‘दाल’ में ‘नमक’ तो चल जाता है, लेकिन ‘नमक’ में ‘दाल’ भला कहाँ चलती। दागी राजनेता और दोषी राजनीति पर भी यही बात लागू होती है। अपरिपक्व और उन्मुक्त जनसंचार माध्यमों ने इतनी सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और नीतिगत उलटबासी परोसी है कि हमारा समाज कुंठित होकर आपराधिक प्रवृत्ति का पालक, पोषक और प्रोत्साहक बन चुका है, जो कि जनचिंता की बात है। कुत्सित जातीय सोच, विकृत साम्प्रदायिक नीयत, क्षेत्रीय विसंगतियों और प्रशासनिक लापरवाही से स्थिति निरंतर जटिल से जटिलतर होती गई। यही वजह है कि दागी नेताओं की बढ़ती संख्या से भारतीय लोकतंत्र हांफ रहा है और हमारी संसद, विधानमंडल, त्रिस्तरीय पंचायती निकायें किंकर्तव्यविमूढ़ बनी हुई हैं। लेकिन इस विषम परिस्थिति से प्रबुद्ध लोग चिंतित हैं और न्यायिक शरणागत भी, जिसका प्रतिफल सामने आया है।

आपको जानकर हैरत होगा कि विकास और व्यवहारगत कार्यों के लिये शासनतंत्र के समानांतर एनजीओज-ट्रस्ट संस्कृति को बढ़ावा देने वाली केंद्र सरकार इस अहम मसले पर ‘इलेक्शन वॉच’ सरीखे एनजीओ द्वारा दोषी नेताओं के बारे में एकत्रित आंकड़े को भी हल्के में ले रही है। दूसरी ओर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिये विभिन्न एनजीओज व अन्य संस्थाओं को तरह तरह से फंडिंग करने वाला चुनाव आयोग भी ऐसे गम्भीर मामले में आंकड़े एकत्र करने के लिये ‘इलेक्शन वॉच’ एनजीओ की नेक पहल को भी नजरअंदाज कर रहा है। जबकि उसने आयोग में दी गई चुनावी शपथ-पत्र के मुताबिक ही वर्ष 2014 के चुनाव के बाद 1581 नेताओं के खिलाफ आपराधिक मामलों के आंकड़े एकत्र किये हैं जिनके खिलाफ मुकदमें लम्बित हैं। कहना न होगा कि कुछ और एनजीओज भी हैं जो ऐसे आंकड़े इकट्ठा कर रहे हैं और उन्हें समय समय पर सार्वजनिक भी करते रहते हैं। इसलिये सरकार भी उन्हें भरोसे में लेकर उन आंकड़ों का समुचित प्रयोग कर सकती है, बशर्ते कि उसकी मंशा साफ और स्पष्ट हो।

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