रितेश सिन्हा। गुजरात के चुनावी समर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख लगी हुई है। मोदी बेहतर जानते हैं कि गुजरात में चुनाव के क्या मायने हैं, लिहाजा प्रधानमंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष दोनों ही ताबड़तोड़ रैलियां और जनसभाओं के जरिए जनता की नब्ज टटोल रहे हैं। देखा जाए तो 2014 में भाजपा की जबर्दस्त जीत के बाद पहली बार भाजपा के इन दोनों शीर्ष नेताओं की नींदें उड़ी हुई हैं। मोदी सरकार द्वारा लागू किए गए नोटबंदी की मंदी का असर अब भी कायम है। लगी सही कसर हड़बड़ी में लागू किए गए जीएसटी ने पूरी कर दी। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो केंद्र सरकार के दो आला मंत्रियों व मोदी-शाह के वफादार कानूनची अरूण जेटली और पीयूष गोयल हमेशा भाजपा का बचाव करते नजर आए हैं, मगर ये दोनों दो बड़े फैसले का राजनीतिक आकलन करने में चूक कर बैठे जिसकी भारी कीमत भाजपा को चुकानी पड़ सकती है। भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा और वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके अरूण शौरी मोदी सरकार की इन्हीं नीतियों की धज्जियां उड़ा चुके हैं।
अभी तक निर्वाचन आयोग ने चुनाव की तारीखों की घोषणा नहीं की है, लिहाजा वक्त की नजाकत को समझते हुए मोदी सूबे में हजारों करोड़ों की घोषणाओं के बदले जनता से फिर से उसी समर्थन की गुहार लगा रहे हैं। भाजपा के लिए गले की हड्डी बन चुका जीएसटी पर आनन-फानन में बैठक बुलाई गई थी। मोदी ने शाह-जेटली से मुलाकात कर जीएसटी के दरों में रियायत की घोषणा की थी। पीएम यहां तक कह चुके हैं कि जीएसटी काउंसिल के फैसले की वजह से दीवाली 15 दिन पहले ही आ गई। द्वारका के सुंदरनगर स्थित चोटिला में एक रैली में जीएसटी का राग अलापा। केवल नोटबंदी से फायदे दिखाने और जीएसटी से होने वाले बदलाव की मुनादी ही गुजरात में जीत दिलाने के लिए काफी नहीं है। कांग्रेस ने 100 से अधिक पदाधिकारियों की नियुक्तियां की है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सिद्धार्थ पटेल को चुनाव प्रचार समिति का नेतृत्व भार सौंपा गया है। उनका हाथ दीपक बाबरिया और गौरव पांड्या बंटाएंगे। विजय दवे को चुनाव प्रचार समिति का संयोजक, शक्ति सिंह गोहिल को मीडिया कमिटी का अध्यक्ष, नरेश रावल को शहरी इलाकों के चुनाव समन्यवय समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। प्रदेश महासचिव रह चुके हिमांशु पटेल भी चुनाव मीडिया समिति के संयोजक का कार्यभार देखेंगे। इसके अतिरिक्त 10 नए उपाध्यक्ष, 14 महासचिव, 63 सचिव, 7 प्रवक्ता और 4 कार्यकारिणी समिति के सदस्यों को मनोनित किया जा चुका है। वहीं भाजपा खेमे का नेतृत्व मोदी-शाह के सबसे करीबी अरूण जेटली कर रहे हैं। उनके अतिरिक्त नरेंद्र सिंह तोमर, निर्मला सीतारमण, डॉ. जितेन्द्र सिंह और पी.पी. चौधरी जैसे केंद्रीय मंत्री सहप्रभारी बनाए गए हैं।
आरएसएस के हालिया सर्वे ने भी भाजपा नेताओं के लिए परेशानी का सबब है। सर्वे के अनुसार कांग्रेस गुजरात में मजबूत स्थिति में है और भाजपा के वोट में 8 से 10 फीसदी की गिरावट तय है। भाजपा की परेशानी की दूसरी महत्वपूर्ण वजह कांग्रेस उपाध्यक्ष की बदली हुई राजनीतिक शैली है जिसकी काट भाजपा को नहीं मिल रही। जो भाजपा अपने प्रचार तंत्र से राहुल को एक धर्मविशेष का नेता बताने और उनका हितैषी बताकर पेश कर रही थी, उसी चक्रव्यूह को तोड़ने में राहुल लगे हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि हिन्दुत्व से बेहतर इस तोड़ का दूसरा कोई और विकल्प नहीं हो सकता। इसका परिणाम है कि लगातार मोदी की मंदिर पॉलिटिक्स को राहुल चुनौती दे रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में राहुल और मोदी की मंदिर पॉलिटिक्स ने राजनीति की फिजा बदली है। राहुल ने तो मंदिर जाने के मामले में मोदी को भी पीछे छोड़ दिया है। उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद राहुल का हिन्दुत्व कार्ड देखने को मिला है। वे अब तक 15 मंदिरों में दर्शन कर चुके हैं। जबकि मोदी सिर्फ 13 मंदिरों में गए हैं। इतना ही नहीं जिस प्रकार विदेशों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की नीतियों की आलोचना कर अपनी ओजपूर्ण भाषण शैली से एक खास जगह बनाई, राहुल उनको उसी अंदाज में विदेशों में मात देने की कोशिश की। बार्कले विश्वविद्यालय से लेकर विदेशी सरजमीं पर अधिकतर भाषणों में युवाओं को संबोधित करते दिखे। राहुल भली-भांति जानते हैं कि मोदी ने युवाओं के सहारे प्रचंड बहुमत हासिल किया था।
गुजरात में 90 के दशक से मंदिर पालिटिक्स हमेशा से हावी रही है जिसमें द्वारकाधीश का स्थान सर्वोपरि है। सोमनाथ के मंदिर पूजन से ही भाजपा के लौह-पुरूष और वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवानी अपनी राजनीतिक यात्राओं की शुरूआत करते रहे हैं। 45-50 सीटों पर द्वारकाधीश का सीधा प्रभाव है। यही वजह रही है कि हर महत्वपूर्ण अवसर की शुरूआत भाजपा के शीर्ष नेता इसी मंदिर की पूजा-अर्चना से करते आए हैं। इस मंदिर पालिटिक्स की शुरूआत भी मोदी ने 2014 लोकसभा चुनाव से की। अक्सर देश-विदेश की यात्रा के दौरान उन्हें मंदिर के पट पर सिर झुकाते देखा गया है। राहुल ने उसी तर्ज पर गुजरात अभियान की शुरूआत द्वारकाधीश मंदिर से की। इसके पूर्व वे देवभूमि के चुनाव के उपरांत 2015 में केदारनाथ मंदिर पहुंचे थे। हालिया गुजरात दौरे में भी कांग्रेस उपाध्यक्ष द्वारकाधीश मंदिर के अलावा खोडियार माता दर्शन के लिए खोडाल धाम मंदिर गए। इसके पीछे की राजनीति यह है कि खोडियार माता में लेउवा पटेल की बेहद आस्था है। पाटीदार में करीब 60 प्रतिशत आबादी लेउवा पटेलों की है। जेतपुर के रास्ते में वह दासी मंदिर और जलराम मंदिर भी गए थे। पाटीदार समाज का एक बड़ा वोट बैंक है जो विगत दो दशकों से अधिक समय से भाजपा की वोटर रही हैं। राहुल इस समीकरण को तोड़ने के लिए पाटीदार समाज के युवा नेता हार्दिक पटेल से मुलाकात कर चुके हैं और कांग्रेस को उनके समर्थन पर पूरा भरोसा है। मोदी भी पीछे कहां हटने वाले हैं। इसी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली और पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल हर मंदिर दर्शन में उनके साथ साए के साथ दिखी। मोदी के गृहक्षेत्र मेहसाना जिले के वडनगर में भी मोदी के साथ भले की प्रोटोकाल के रूप में प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी दिखे, मगर आनंदीबेन भी मोदी के साथ हर मौके पर दिखी। यानी पहले मोदी जिस बात पर लीड लेते थे, राहुल मोदी को उन्हीं की जुबान चुनौती पेश रहे हैं।
संघ के द्वारा किए गए सर्वे में भाजपा के प्रति गुस्से का कारण पिछड़े लोगों में आरक्षण की प्रणाली में हुए बदलाव है। हार्दिक की अगुवाई में पाटीदार आंदोलन के दौरान 14 लोगों की मौत हुई थी। सूबे में कोली मछुआरा समुदाय की आबादी 24.22 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति और पाटीदार समुदाय की आबादी 17.61 प्रतिशत और दलितों की आबादी 7.17 प्रतिशत और मुस्लिम समुदाय की आबादी 8.53 प्रतिशत है। मछुआरा और पाटीदार पश्चिमी गुजरात में बड़ा राजनीतिक प्रभाव रखते हैं, वहीं सौराष्ट्र-कच्छ में 58 सीटों में से 36 पर लेउआ पटेलों की रसूखदारी भी भाजपा के लिए बड़ी मुसीबत बनकर सामने आ सकती है। सौराष्ट्र की 46 सीटों और दक्षिणी गुजरात की 13 सीटों पर मछुआरा समुदाय का प्रभाव है जिनकी नाराजगी भाजपा के लिए खुल कर आई है और यही चिंता मोदी और शाह टीम को खाए जा रही है। कुल मिलाकर देखा जाए तो भाजपा और कांग्रेस दोनों ही मंदिर पालिटिक्स के साथ-साथ पाटीदार, कोली, मछुआरा और लेउली समुदाय के लोगों को साधने में जुटी हैं।
प्रधानमंत्री के वडनगर दौरे के बीच ही राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदला। एक तरफ तो मोदी के स्कूल, मंदिर और विभिन्न योजनाओं के शिलान्यास ने सुर्खियां बटोरी, मगर शाम होते-होते कांग्रेसी खेमे के नए नारे ने राजनीति को नई दिशा की तरफ मोड़ दिया। दरअसल अमित शाह के बेटे जय शाह की कंपनी टेंपल एंटरप्राइजेज के मुनाफे में 16000 गुणा की वृद्धि का मामला सामने आया। चूंकि जय का मामला सीधे तौर पर भाजपा अध्यक्ष से जुड़ा हुआ है लिहाजा कांग्रेस हमलावर स्थिति में आ गई। कांग्रेस प्रवक्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने एक वेबसाइट की खबरों के हवाले सीधे तौर पर भाजपा को घेरने का प्रयास किया। सिब्बल ने वेबसाइट में प्रकाशित खबर का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि 2015-16 में जय शाह की कंपनी का सालाना कारोबार 50 हजार रुपये से बढ़कर 80.5 करोड़ रुपये तक पहुंचने की जांच होनी चाहिए। कांग्रेस प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि भाजपा के सत्ता में आने के एक साल के भीतर ही शाह की कंपनी का टर्नओवर 16000 गुना बढ़ा।
मामले को बढ़ता देख भाजपा की तरफ से केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने मोर्चा संभाला। पीयूष गोयल ने जानकारी दी कि वेबसाइट पर छपी खबर गढ़ी गई है और अमित शाह के बेटे जय शाह अहमदाबाद में वेबसाइट के संपादक और रिपोर्टर के खिलाफ 100 करोड़ रुपये की मानहानि का आपराधिक मुकदमा दर्ज कराएंगे। बकौल गोयल वेबसाइट ने भ्रामक, अपमानजनक और आधारहीन खबर के जरिए अमित शाह की छवि खराब करने की कोशिश की है। चूंकि चुनावी माहौल है इसलिए राहुल भी चुटकी ली। उन्होंने ट्वीट के जरिए तंज कसा कि आखिर पता चल गया है कि नोटबंदी का फायदा किसको हुआ। न आरबीआई, न गरीब, न किसान। इट्स द शाह एंड शाह इन एंड शाह आफ डेमो-जय अमित। यानी हर-हर मोदी घर-घर मोदी के नारे के बीच एक नया नारा राजनीतिक हलकों में तैर रहा है जिसे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दिया। गोयल की सफाई के बाद जय शाह ने भी अपनी सफाई में खुद को पाक साफ बताया। जय शाह ने कहां कि मेरी प्रतिष्ठा को नीचा दिखाने की कोशिश की गई है. लोगों के मन में ऐसी छवि बनाने की कोशिश की गई है कि मेरे व्यवसाय में मेरी सफलता मेरे पिता की राजनीतिक हैसियत से मिली है। मेरा व्यवसाय पूरी तरह से कानून का पालन करता है. जो मेरे टैक्स रिकार्ड और बैंक ट्रांजेक्शन से पता चलता है। किसी कॉपरेटिव बैंक से लोन नियम कानून के हिसाब से लिए गए। मेरे पास छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है।
मगर भाजपा की मुसीबत यहीं नहीं रूकती। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश मेहता भी मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं। नरेंद्र मोदी को एमबी शाह कमीशन के जरिए दी गई क्लीनचिट पर गुजरात बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्री का कहना है कि एमबी शाह कमीशन की जांच को पूरी तरह से सरकार के प्रभाव में तैयार किया गया है। सुरेश मेहता के अनुसार 17 ऐसे घोटाले थे जिसको लेकर कांग्रेस ने भी तत्कालीन राष्ट्रपति से राज्य में लोकायुक्त की मांग की थी। लोकायुक्त ना बनाना पड़े इसलिए उस वक्त की मोदी सरकार ने एमबी शाह कमीशन का गठन किया था। मेहता ने मोदी और उस समय की राजस्व मंत्री आनंदीबेन पटेल पर भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगाए। पूर्व मुख्यमंत्री के अनुसार सीएम कार्यालय और राजस्व मंत्रालय के जरिए इंडी गोल्ड रिफाइनरी कच्छ की 36‐25 एकड़ खेती की जमीन को कम कीमतों पर बेच दिया गया जिसे बाद में प्रति एकड़ 70 लाख रुपये पर बेचा गया। उन्होंने यह भी कहा कि सुजलाम सुफलाम योजना में दो कमीशन बने थे. पीएसी और कैग दोनों ने कहा था कि घोटला हुआ है, जबकि शाह कमीशन ने कहा कि पीएसी तय करेगी। गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के जरिए बड़े पैमाने पर तेल के कुएं मिलने की बड़ी-बड़ी घोषणा के बाद सरकारी भ्रष्टाचार का भी उन्होंने जिक्र किया है। 1881 पन्नों की इस रिपोर्ट को लेकर अब भी कई सवाल बने हुए हैं। अगर तत्कालीन गुजरात सरकार को क्लीन चिट मिली तो रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। इस रिपोर्ट के लिए नियम बनाया गया है कि कोई इसकी फोटोकॉपी नहीं कर सकता है ओर ना ही कोई मोबाइल में फोटो ले सकता है। मेहता का यह भी आरोप है कि एमबी शाह का रिपोर्ट ऐसी तैयार करवाई गई है जिससे सरकार को बचाया जा सके और जहां नहीं बच सके वहां अलग-अलग रिपोर्ट का हवाला देकर सरकार को क्लीन चिट दी गई।
गुजरात विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक दलों ने गुजरात चुनाव के लिए शंखनाद भी कर दिया है। विगत तीन दशकों से गुजरात की राजनीति पर अपना आधिपत्य जमा चुकी भाजपा के लिए इस बार की स्थिति करो या मरो की है। चौतरफा हमले झेल रही भाजपा अगर चुनाव हारती है तो केंद्र के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल जाएंगे, अगर जीत का अंतर कम रहा तब भी मोदी-शाह सवालों के घेरे में आएंगे। ऐसे में भाजपा का यह प्रयास है कि एक तरफ जो जीत भी सुनिश्चित हो और दूसरी तरफ कांग्रेस अपनी खोई जमीन वापस न कर सके। देखना है कि इस राजनीतिक शह और मात के खेल में किसी मिट्टी पलीत होती है और कौन सुरमा बनता है। मगर ताजा राजनीतिक घटनाक्रम तो कांग्रेस के लिए कम भाजपा के लिए अधिक सिरदर्द पैदा करने वाले हैं।
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