रितेश सिन्हा
 राजनीति जो ना करा दे। जातीय और धर्म की राजनीति सुकून भी देती है प्रताड़ित भी करती है। समय के साथ इस खेल का मजा राजनेता खूब लेते हैं। जब से बीजेपी ने बंगाल और ओडिशा में बढ़त लेने की कोशिश की है ममता बनर्जी सतर्क हो गयी है। पश्चिम बंगाल और उड़ीसा का राजनीतिक महत्व है। राजनीतिक दृष्टि से इन दोनों प्रदेशों को लेकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति बना चुके हैं और उसकी के अनुसार भाजपा अपना विस्तार भी इन राज्यों में कर रही है। वर्तमान में देश के 18 प्रदेशों में भाजपा अपने सहयोगियों के जरिए सत्ता सुख भोख रही है, मगर बंगाल और उड़ीसा उनकी जद से बाहर रहा है। यही वजह है कि विगत कई कुछ वर्षों से भाजपा इन सूबों में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए लगातार रैलियां और गोष्ठियों का आयोजन कर रही है। शाह और उनकी टीम भली-भांति जानती है कि नीतीश कुमार के भाजपा के गोद में जाने के बाद पूर्वी राज्यों में क्षेत्रीय दलों में ममता ही अकेले ऐसी नेत्री हैं जो भाजपा और मोदी को कड़ी टक्कर दे सकती हैं जो 2019 में उनके सपनों को चकनाचूर भी कर सकता है।
ममता मोदी सरकार की नीतियों के प्रति सख्त तेवर अपनाते हुए कड़ी आलोचना करती रही हैं। बदलते समय के साथ ममता बनर्जी ने भी अपनी अपनी राजनीतिक धार को थोड़ा साॅफ्ट किया है। पुराने सहयोगी मुकुल राय के तृणमूल कांग्रेस छोड़ने और भाजपा के पाले में जाने के बाद ममता को अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ा है। इसी बदलाव के तहत अब वो कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है जिससे भाजपा की सूबे में जड़ें मजबूत हो सके। इसी के मद्देनजर टीएमसी ने वीरभूम जिले में हिन्दुत्व कार्ड खेलते हुए ‘ब्राह्मण एवं पुरोहित’ सम्मेलन का आयोजन किया। वीरभूम जिला अध्यक्ष अनुब्रत मंडल की अगुवाई में आयोजित इस सम्मेलन से भाजपा पूरी तरह बौखला गई है। भाजपा को लगता है कि मुस्लिमों में ममता की अब भी पकड़ है, अगर हिन्दू वोटरों ने उनका साथ नहीं दिया तो पश्चिम बंगाल में उनकी सत्ता में कभी वापसी नहीं हो सकती। लिहाजा भाजपा ने चैरतफा हमला करते हुए इस सम्मेलन को तुष्टिकरण से जोड़ दिया। पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने आरोप लगाते हुए कहा कि टीएमसी भाजपा के पक्ष में ‘‘हिंदू वोटों’’ को इकट्ठा नहीं होने देने के मकसद से ‘नरम हिंदुत्व’ अपना रही हैं। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति कर रही है और मुस्लिम तुष्टिकरण के बाद अब हिन्दुओं को लुभाने में लगी हुई है। अनुब्रत मंडल ने यहां तक कहा कि उन्हें हिंदुत्व की परिभाषा जल्लादों से जानने की जरूरत नहीं है। उनके आवासीय परिसर में चार शिव मंदिर हैं और वह हर साल अपने घर पर दुर्गापूजा भी करते हैं। अगर उन्हें हिंदुत्व सीखना ही पड़ा तो वह पुरोहितों से ही शिक्षा लेंगे। देश में सबसे बड़ा हिंदुत्ववादी हमारे पुरोहित (ब्राह्मण) ही हैं। आपको बता दें कि इसके पूर्व ममता बनर्जी गंगा सागर द्वीप जाकर मकर संक्रांति की तैयारियों का जायजा ले चुकी हैं।
मगर यह पहला मौका नहीं है जब भाजपा ने विपक्षी पार्टियों के हिन्दुत्व एजेंडे पर अंगुली उठाई हो। गुजरात चुनाव के समय भी वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब मंदिर-मंदिर जाकर माथा टेकना प्रारंभ किया तो बड़े पैमाने में सोशल मीडिया और बयानवीर नेताओं के जरिए भाजपा ने राहुल को आड़े हाथों लिया था। उन्होंने इसकी शुरूआत देवभूमि के केदारनाथ धाम से की थी जब कांग्रेस को उत्तराखंड में बुरी तरह पराजय का सामना करना पड़ा था। उसके बाद लगातार देश में जहां कहीं भी राहुल को मंदिर दर्शन का मौका मिलता है, वे अवश्य जाते हैं। राहुल गांधी की मंदिर पालिटिक्स को देखते हुए भाजपा उन्हें जेनऊधारी कहकर संबोधित करने लगी। पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय भी राहुल के मंदिर दौरे पर निशाना साध चुके हैं। उन्होंने कहा था कि पहले वे एक खास समुदाय के मदरसे में जाते थे, गोल वाली टोपी लगाते थे और इसे धर्मनिरपेक्षता बताते थे। मंदिरों में जाना सांप्रदायिक होता था, अब वे सारे नेता मंदिरों में जा रहे हैं। विजयवर्गीय ने यहां तक कहा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दुर्गा विसर्जन रुकवाने का काम करती थीं, लेकिन अब मंदिरों में जा रही हैं, गंगासागर जा रही हैं, संस्कृत श्लोक पढ़ रही हैं। ममता का यह कदम भाजपा के हिंदू वोटों को अपनी तरफ करने की मंशा से उठाया गया है। भाजपा नेता का कहना है कि कल तक जो ममता तुष्टिकरण की राजनीति कर रही थीं, अब गाय और गीता बांट रही है। देखना है कि ममता के इस हिन्दुत्व कार्ड का काट भाजपा किस प्रकार से खोजती है। वैसे राजनीतिक दलों की मंदिर पालिटिक्स में बढ़ती दिलचस्पी को देखते हुए यह बात को साफ है कि भाजपा की कोर हिन्दुत्व एजेंडे को 2019 में कड़ी चुनौती मिलने वाली है।
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