कमलेश पांडे की तीखी बात

भारत एक ऐसा देश है जिसने दुनिया के मंचों पर हमेशा रचनात्मक भूमिका निभाई है। हम किसी भी देश के साथ अपनी नीति का मूल्यांकन लाभ-हानि के आधार पर नहीं, बल्कि  मानवीय मूल्यों के आईने में करते हैं। हम किसी की जमीन और संसाधन पर नजर नहीं रखते, न ही हमारे विकास का मॉडल ‘एक हाथ से लो और दूसरे हाथ से दो’ की अवधारणा पर आधारित है, बल्कि हमारी मदद मानवीय मूल्यों पर आधारित है। हम महात्मा गांधी के अहिंसा दर्शन से चरमपंथ और कट्टरपंथ का मुकाबला करने में विश्वास करते हैं। प्रवासी सांसद सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत दिनों जितनी शालीनता पूर्वक सशक्त, सहृदयी और सहनशील भारत को परिभाषित किया, वह न केवल ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की उदात्त पुरातन भावना को मजबूती प्रदान करता है, बल्कि अपने सार्वदेशीय, सार्वकालिक और सार्वभौमिक महत्व को भी जगजाहिर करता है। इससे स्पष्ट है कि नया भारत अपनी नई वैश्विक भूमिका को निभाने को ततपर है, प्रतिबद्ध है और अपनी भावी पीढ़ी को अपने नैतिक उत्तरदायित्व का एहसास भी करवा रहा है।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि नए भारत (न्यू इंडिया) के निर्माण में भारतवंशियों (प्रवासी भारतीयों) की अहम भूमिका है, क्योंकि दुनिया भर में मौजूद भारतीय मूल के लोग वास्तव में देश के स्थायी राजदूत हैं। यही वजह है कि जब भी भारतीय प्रधानमंत्री मोदी किसी देश की यात्रा करते हैं तो वहां मौजूद भारतीय मूल के लोगों से मिलने का प्रयास करते हैं, क्योंकि उनका स्पष्ट मानना है कि विश्व के साथ भारत के सम्बन्धों के लिये यदि कोई सही मायने में राजदूत है तो वे भारतीय मूल के लोग हैं, जिनकी प्रगति से भारत का नाम भी ऊंचा होता है। लिहाजा, भारत के विकास के उनके प्रयासों में वो प्रवासी भारतीयों को अपना अभिन्न सहयोगी मानते हैं। क्योंकि न्यू इंडिया में प्रवासी भारतीयों का अहम भूमिका है और देश के विकास में वे उत्प्रेरक का काम कर सकते हैं।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि भारतीय मूल के प्रवासी जहाँ जहाँ भी गए, वहीं पूरी तरह से समावेशित होकर, घुल मिलकर उस जगह को अपना घर बना लिया। लेकिन इसके बावजूद अपने दिलों और परंपराओं में अपनी भारतीयता को जीवित रखा। विशेषकर गिरमिटिया देशों के सांसद ऐसे लोग हैं जिनके पूर्वज भोजपुरी और मगधी बोलते थे। कहना न होगा कि मॉरीशस, आयरलैंड और पुर्तगाल के मौजूदा प्रधानमंत्री भारतीय मूल के हैं। फिजी, गुयाना, जमैका के शासन का भी भारतवंशी नेतृत्व दे चुके हैं। कनाडा के रक्षा मंत्री हरजीत सज्जन और अन्य तीन कैबिनेट मंत्री भी भारतवंशी हैं। 2017 के ब्रिटिश आमचुनाव में रिकॉर्ड 12 भारतीय मूल के सांसद चुने गए।

निस्संदेह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गतिशील नेतृत्व में भारत और भारतीय मूल के लोगों को विभिन्न देशों के बीच अधिक मान्यता और लोकप्रियता मिली है। उनकी प्रत्येक देश की यात्रा में उमड़ने वाले विशाल जनसमूह इसका सबूत है। इससे विश्व में भारत का प्रभुत्व बढ़ रहा है और इसका श्रेय यदि किसी को जाता है तो वह प्रधानमंत्री मोदी हैं। उनके नेक प्रयासों से उनके कार्यकाल में भारत में अहम बदलाव आया है। हमारे प्रति विश्व का नजरिया भी बदल रहा है। भारतीयों की आशाएं इस समय उच्चतम स्तर पर हैं। व्यवस्थाओं में हो रहे परिवर्तन का, इसमें हो रहे अपरिवर्तनीय बदलाव का परिणाम आपको हर क्षेत्र में नजर आएगा। यही वजह है कि देश में आने वाले निवेश में से आधा पिछले तीन वर्षों में आया है। पिछले वर्ष देश में रिकॉर्ड 16 अरब डॉलर का निवेश आया। यह सरकार की ओर से दूरगामी नीतिगत प्रभाव वाले निर्णयों के कारण आये हैं जो सुधार और बदलाव के मार्गदर्शक सिद्धांत पर आधारित हैं।

सर्वाधिक खुशी की बात है कि भारत आज वैश्विक एजेंडा तय करने वाला देश बनकर उभरा है। प्रधानमंत्री वैश्विक मंच पर केवल कालेधन के मुद्दे पर चर्चा करके नहीं आते, बल्कि स्वदेश लौटकर नोटबन्दी, जीएसटी जैसी साहसिक पहल का निर्णय करते हैं। वह दुनिया को यह दिखाते हैं कि हम जो कहते हैं, वह करते भी हैं। प्रधानमंत्री जब हैम्बर्ग जाते हैं तब आतंकवाद से कैसे लड़ा जाय, इस बारे में 11 सूत्री एजेंडा पेश करते हैं। वह संयुक्त राष्ट्र में जब टिकाऊ विकास लक्ष्य (एसडीजी) पर बोलने जाते हैं तब गरीबी उन्मूलन के विषय को सामने रखते हैं।

याद दिला दें कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 9 जनवरी 1915 को दक्षिण अफ्रीका से मुम्बई बंदरगाह पहुंचे थे। इसलिये वर्ष 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने दुनिया भर में बसे भारतीयों को एक मंच देने के लिये ‘प्रवासी दिवस’ (9 जनवरी) को मनाने की शुरुआत की। इस वर्ष के प्रवासी सांसद सम्मेलन के लिये 30 देशों को भारत सरकार की ओर से न्यौता भेजा गया, जिसमें 24 देशों के भारतीय मूल के सांसद और विधायक ने शिरकत किया। यह भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता और विश्वसनीयता की दिशा में अभूतपूर्व कदम है जिसकी जितनी भी सराहना की जाय, वह कम है।

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