रितेश सिन्हा। कांग्रेस में राहुल के बढ़ते प्रभाव से अहमद पटेल के करीबी नेताओं में हड़कंप मचा हुआ है। राहुल को बाबा कहकर उपहास करने वाले नेता ‘‘आरजी आफिस‘‘ के रडार पर हैं। सबसे ज्यादा बेचैनी महाराष्ट्र में महसूस की जा रही है जहां संगठन में माल कमाने के आदी हो चुके दागदार अशोक चव्हान और वसूली के लिए कुख्यात मोहन प्रकाश की जोड़ी राहुल की अध्यक्षता में अपने पद को बचाने के लिए सारी तिकड़में लगाए हुए है। ऐसा नहीं है कि आरजी आफिस को उनकी इन हरकतों का अंदाजा नहीं, लेकिन चरणबद्ध तरीके से कुशल राजनेता की तरह राहुल ने एआईसीसी के बड़े कमरों में बड़े नेताओं के पर काटे हैं। यही वजह है कि कोई पदयात्रा करके प्रायश्चित कर रहा है तो किसी का पूजा-पाठ जारी है। इसी कड़ी में पूरे तीन साल के कार्यकाल में कभी कार्यकारिणी की मीटिंग न बुला पाने वाले अशोक चव्हान प्रदेश भर का राहुल की ताजपोशी के पहले दौरा कर नाप लेना चाहते हैं। इसी क्रम में उन्होंने विदर्भ से उठ रहे अपने विरोध को दबाने के लिए यावतमल में डेलीगेट्स की मीटिंग लेने के तुरंत बाद गुलाम नबी आजाद के खास मिर्जा के घर यावतमल जिले के पूसद में सजदा करके आए। आजाद ने अपने पिछले तीन-चार महीनों से सूबे में कर रहे दौरों में अशोक चव्हान की दागदार छवि और पार्टी के महाराष्ट्र प्रभारी मोहन प्रकाश के द्वारा जिला और शहर अध्यक्षों की नियुक्ति में लेन-देन की जानकारी भी उन्होंने कांग्रेस उपाध्यक्ष को दी थी। यही वजह है कि गुलाम नबी आजाद को महाराष्ट्र में अघोषित रूप से संगठन को मजबूत करने और अशोक चव्हान और मोहन प्रकाश की जोड़ी द्वारा किनारे किए गए पुराने कांग्रसियों को महत्व देने का काम सौंपा गया। यही वजह रही कि नांदेड़ जैसी जगह जहां अशोक के खड़ूस व्यवहार से पार्टी छोड़कर कांग्रेसियों ने पार्टी छोड़ दिया था, वही अल्पसंख्यक समुदाय के कांग्रेसी कार्यकर्त्ताओं और नेताओं ने एमआईएम के औवेसी खेमे में चले गए थे। आजाद के बुलावे पर वापसी कांग्रेस में आए और भाजपा-शिवसेना गठबंधन को धूल चटा दी। कार्पोरेटर तक से माल वसूलने वाले ये दोनों की जोड़ी सर पर पगड़ी बांधकर इसे अपनी कामयाबी बता रही है। हालात देश के ये हैं कि राहुल गांधी के नेतृत्व को युवा पीढ़ी ने स्वीकार किया है और किसानों की लड़ाई को ईमानदारी से लड़ने की वजह से काश्तकार, जीएसटी से बौखलाए कारोबारी व व्यापारी भी कांग्रेस उपाध्यक्ष के सुर में सुर मिलाकर मोदी को उखाड़ फेंकने को तैयार दिखते हैं।
अशोक चव्हान द्वारा अब तक के चुनावों में टिकट मांगने वालों से आवेदन के बदले अच्छी-खासी रकम वसूली, लेकिन प्रचार के नाम पर राहुल गांधी का एक बिल्ला, दुपट्टे और झंडे की बात कौन करता, उपलब्ध नहीं करा पाए। देश भर में राहुल के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए अब ये जोड़ी प्रदेश भर में 6 रैलियों का आयोजन कर रही है। ये भी बड़ा दिलचस्प है कि पार्टी महासचिव गणेश पाटिल ने 36 जिलों में फोन करके रैली करने को कहा था और जिला अध्यक्ष, शहर अध्यक्षों और कार्यकर्त्ताओं से डेट मांगी थी, मगर उन्हें टका सा जवाब ना में मिला। कारण आम महाराष्ट्र में कांग्रेसी इनके पिछले कार्यकलापों को देखते हुए दुबारा अध्यक्ष बनने को दूर की कौड़ी मान रहा है। वसूली में नागपुर में मुंह काला कराए प्रदेश अध्यक्ष इतने पर भी बाज नहीं आए। कार्पोरेशन में टिकट बेचने के बाद नागपुर मनपा के नेता सदन का भी पद बेचना चाहते थे, उसमें कामयाब नहीं हो पाए और नागपुर उच्च न्यायालय से भी उनको मात मिली। लेकिन बेचैन आत्मा बने अशोक चव्हान शांत नहीं बैठेे। फिर से मनपा सदन में नामित सदस्य को लेकर उनके द्वारा टोकन पकड़ने की खबर ने तूल पकड़ लिया था और नेता सदन ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए सभी सदस्यों की सर्वसम्मति से नियुक्ति की थी जिसे खुद अशोक चव्हान ने अपने कारिंदे के जरिए अपने अधिकारों का प्रभाव बताते हुए हाईकोर्ट तक में दस्तक दी थी। मगर वहां भी मात खा गए।
ऐसा नहीं है कि अशोक चव्हान के आरजी आफिस से संबंध नहीं हैं। वेे नागपुर के ही अलंकार को अच्छी खासी रकम के प्रभाव में लेकर अपने को बचाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। जिस तरीके से उन्होंने अपने विरोधियों को डेलीगेट्स तक नहीं बनने दिया है, उसको लेकर हाईकमान भी सकते में है। राहुल के अध्यक्ष बनते ही उन सारी शिकायतों का समाधान भी संभव है। अशोक विरोधी खेमा राहुल की ताजपोशी का इंतजार कर रहा है और अशोक-मोहन प्रकाश की जोड़ी की खबर आरजी आफिस को बराबर मिल रही है। लेकिन उन्हें थोड़ा इंतजार करने और धैर्य रखने को कहा जा रहा है। अशोक चव्हान खेमे पर राष्ट्रपति चुनाव में संपूर्ण विपक्ष की साझा उम्मीदवार कांग्रेस की मीरा कुमार के खिलाफ भी क्रॉस वोटिंग कराने का पुख्ता आरोप है। चव्हान द्वारा अपने खासमखास विधानसभा में सदन उपनेता कांग्रेस के विजय वडेतीवार को सौंपी थी, जिन्होंने इसको अंजाम दिया और सूबे से 11 क्रॉस वोट भाजपा की झोली में डलवाए गए, जिसके इनामस्वरूप इसी प्रदेश में स्वतंत्र भारत में पहली बार विपक्ष के उपनेता को राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया है। इन्हीं वडेतीवार को इन रैलियों को सफल बनाने के लिए एकबार फिर चव्हान ने जिम्मेदारी सौंपी है। आपको बता दें कि 31 अक्तूबर इंदिरा गांधी की जयंती से लेकर नवंबर के पहले पखवाड़े तक 6 रैलियां आयोजित होनी है जिनमें कोंकण, चंद्रपुर, उस्मानाबाद, महाड़ और अहमदनगर के नाम प्रस्तावित हैं।
अशोक चव्हान और उनके परिवार का इतिहास है और यह फितरत है कि वे कमजोर कांग्रेस में बगावती रूख अपनाते रहे हैं। इससे पहले उनके पिता शंकर राव चव्हान भी 78 में कांग्रेस बगावत करके अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ चुके हैं और तब उनकी पार्टी के अध्यक्ष विखे पाटिल हुआ करते थे। अपने परिवार और वफादार व पुराने शिवसैनिक बाला साहिब विखे पाटिल को सदन का नेता बनाया है। वहीं अपने दूसरे वफादार विजय वडेटीवार, जिन्हें सिंचाई मंत्री बनाकर अशोक ने अपने अपने मंत्रीमंडल में खिंचाई का पूरा मौका दिया था, वो भी शिवसैनिक रहे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष के नजदीकी सांसद राजीव सातव ने अशोक के इस सारे कारनामो का सिलसिलेवार ब्यौरा आरजी आफिस को उपलब्ध कराया है। यही वजह है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष ने गुजरात जैसे प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के लिए स्क्रीनिंग कमिटी में बाला साहब थोराट को चेयरमैन बनाया और राहुल की ताजपोशी के बाद उन्हें महाराष्ट्र की कमान देने के संकेत दिए हैं। अशोक चव्हान के सूबे के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस और वित्त मंत्री सुधीर मुनगंतीवार के रिश्तों का सच राहुल के सामने आ चुका है। यही वजह है कि विदर्भ को अलग प्रदेश बनाने की स्थिति में फडनवीस के सामने कांग्रेसी कोई अड़चन न उत्पन्न कर सके, इसका इंतजाम चव्हान ने पीआरओ महेश जोशी को साधकर कर लिया है। अलग विदर्भ कांग्रेस की मांग कर रहे विदर्भ से महाराष्ट्र सरकार के पूर्व मंत्री व पूर्व सांसद, डेलीगेट्स बनने तक से वंचित हैं और खुद को अपमानित महसूस कर रहे हैं। वे राहुल की ताजपोशी में बाधा उत्पन्न न करते हुए उपाध्यक्ष के अध्यक्ष बनने की राह देख रहे हैं। लेकिन ये रार थमने वाली नहीं है। इतना तो तय है कि अशोक चव्हान दुबारा अध्यक्ष नहीं बनेंगे और अहमद के वफादार मोहन प्रकाश संगठन की बात छोड़िए कांग्रेस में रहेंगे या नहीं रहेंगे, इस पर कयास अभी से लगाए जा रहे हैं। राहुल गांधी ने अपने सबसे बड़े राजनीतिक विरोधी अहमद पटेल को गुजरात में अपनी खोज अल्पेश ठाकोर (ओबीसी), जिग्नेश मवानी (दलित) और संपन्न परंपरागत वोटर पाटीदार समाज के नेता हार्दिक पटेल को कांग्रेसी खेमे में लाकर उन्हें जड़ से उखाड़ दिया है।
जिस तरीके से आरोप उन्हीं के गुजरात में उन्हीं के ट्रस्ट के अस्पताल से जुड़े मामले में आईएस आतंकियों के तार जुड़ने के मामले सामने आए हैं, इस पर कांग्रेस ने भी चुप्पी साध ली है। राष्ट्रीय सुरक्षा मसले की गंभीरता को समझते हुए अहमद के वफादार भी सामने आने से कतरा रहे हैं। गुजरात से आ रही खबरों पर गौर करें तो पहली नजर में ये आरोप सही साबित लग रहा है क्योंकि अहमद पटेल उस अस्पताल से जुड़े थे जिसमें आतंकी नौकरी करते थे और अहमद भाई ही उस भरूच अस्पताल के कर्त्ता-धर्त्ता थे। एटीएस ने जिन दो संदिग्ध आतंकियों को उस अस्पताल से गिरफ्तार किया था, उनमें से एक की पहचान कासिम टिंबरवाला के तौर पर हुई जो अंकलेश्वर अस्पताल में काम करना था, वहीं दूसरा आतंकी उबैद वकील के रूप में चिन्हित किया गया। गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी का कहना है कि यह देश की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। पटेल की ओर से चलाए जा रहे अस्पताल में काम करने वाला आतंकी पकड़ा गया। हालांकि चतुर पटेल ने सरकार बदलते ही 2014 में अस्पताल के ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे दिया था, मगर सारा कारोबार वे खुद ही देख रहे थे। इसकी पुष्टि उनके बचाव में बयान दे रहे कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी की है जिसे महज खानापूर्ति ही माना जा रहा है। अब देखना है कि सोमवार को राहुल की अध्यक्षता में हो रही कांग्रेस महासचिवों की बैठक में राहुल के खिलाफ किनके बगावती सुर दिखते हैं और कौन अहमद खेमे की अगुवाई करता है।
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