रितेश सिन्हा। एक समय में देश की सबसे रसूखदार महाराष्ट्र कांग्रेस दिनों-दिन रसातल में जा रही है। भाजपा-शिवसेना की बढ़ती ताकत के सामने कांग्रेसी बौने दिखाई देते हैं। उस पर से कांग्रेस में माल खाऊ नेताओं की कारगुजारियों ने जमीनी कार्यकर्त्ताओं को भी पार्टी से अलग होने पर मजबूर किया है। हालात ऐसे बन चुके हैं कि वो दिन दूर नहीं जब कांग्रेस इतिहास में दफन होने वाली पार्टी बन जाएगी। वर्तमान में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की देवेंद्र फडनवीस सरकार सवालों के घेरे में है, मगर जर्जर होते कांग्रेस के सिपाही उनकी खिलाफत की बजाए उनके किलों को ही मजबूत बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे। भयंकर गुटबाजी से जूझ रही कांग्रेस को सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है ताकि संगठन फिर से अपने पैरों पर खड़ा हो सके।
आदर्श घोटाले के सबसे बड़े मुजरिम अशोक चव्हाण को कांग्रेस ने ताकत दी और नांदेड़ से उम्मीदवार भी बनाया। ऐसा करके कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध अपने उसूलों को दरकिनार करते हुए अशोक पर बाजी लगाई। अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और अपने मुख्यमंत्रीत्व काल में किए गए कार्यों की वजह से वे सांसद की सीट बचाने में तो कामयाब रहे, मगर कार्यकर्त्ताओं के टूटते मनोबल बढ़ाने में नाकाम। वे उन दो सांसदों में एक थे जिन्होंने महाराष्ट्र कांग्रेस का प्रतिनिधित्व संसदीय दल में किया। पैसे की ताकत और अपने पैसे से पूरे प्रदेश कार्यालय और सूबे में पार्टी के होने वाले कार्यक्रम का खर्चा उठाने की जिम्मेदारी मांगकर सोनिया गांधी से अध्यक्षीय पद पर अपनी ताजपोशी कराई। एक जमाने में कांग्रेस मुंबई से ही पैसों का इंतजाम करती रही ताकि राजनीतिक गतिविधियां चलती रहे। इंदिरा के जमाने में रजनी पटेल और उनके बाद रजनी के कारिंदे के रूप में मुरली देवड़ा ने कांग्रेसी खर्चों को संभाला। रजनी के संबंधों की कड़ी के रूप में बने व्यापारिक रिश्तों को देवड़ा ने भुनाया। मुरली के मृत्यु के पश्चात उसका राजनीतिक लाभ उठाते हुए सोनिया के तीन सिपाहसलार मोतीलाल वोरा, अहमद पटेल और जनार्दन द्विवेदी को छल, बल और धन का लाभ देकर अशोक चौहान ने कांग्रेस के मुखिया का पद संभाल लिया। बस यहीं से खेल शुरू हुआ। पैसा लेना अशोक की कमजोरी रही है। अपने पिता और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हाण के गृहमंत्री रहते दिल्ली के राजनीतिक दलाल अशोक को ‘‘माल के चौहान‘‘ के नाम से जानने लगे। दारोगा, सिपाही के ट्रांसफर से लेकर बड़े ओहदेदारों की पोस्टिंग को अशोक ही दिल्ली में अंजाम देते थे। काम के अशोक और माल के चव्हाण की पहचान रखने वाले इस चतुर भ्रष्टाचारी ने कांग्रेसी दिग्गजों को धूल झोंकने में कामयाबी पाई है। यूं कहें कि सोनिया की इन तीनों तिकड़ी भी उनसे चकमा खा गई।
महाराष्ट्र कांग्रेस के एक बड़े नेता का कहना है कि विगत तीन सालों से अध्यक्ष पद संभाल रहे अशोक चव्हाण एक भी दिन कार्यकारिणी की पूर्ण बैठक नहीं ले पाए। अपने गुणा-भाग से पूरी प्रदेश कांग्रेस को चलाने वाले इस नेता ने उन लोगों को ओहदे बांटे जो पार्टी में दूसरे दलों से आए थे। इन्हें सीनियर नेता के ऊपर भी बिठा दिया। उनके इस कारनामे में सूबे के प्रभारी महासचिव मोहन प्रकाश भी शामिल हो गए। एक समय में एक कुर्ता-पायजामा पहनकर पैदल कांग्रेस मुख्यालय आने वाले मोहन की माल भी कमजोरी रही है और मजबूरी भी। अगर आप महाराष्ट्र कांग्रेस के पदों पर नजर मारें तो अशोक के बाद सदन के नेता विपक्ष और उपनेता दोनों ही शिवसैनिक हैं। इनको कांग्रेस के कई वरिष्ठ विधायकों को नजरंदाज करके महत्वपूर्ण बनाया गया। सदन के दोनों नेता भाजपा की बी टीम नजर आते हैं और भाजपा के प्रति इनकी वफादारी का इनाम भी मिला। स्वतंत्र भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में विरले उदाहरण मिलेंगे जिसमें सदन के उपनेता तक को मंत्री पद का ओहदा और सुविधाएं देने का मामला देखा गया है। दरअसल उन्होंने वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के पक्ष में मतदान किया था। उन्होंने उन 11 विधायकों का नेतृत्व भी किया था जिन्होंने कोविंद को वोट दिया था।
मुंबई के दूसरे अध्यक्ष संजय निरूपम को अध्यक्ष बनाने में अशोक-मोहन की जोड़ी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पुराने शिवसैनिक रहे निरूपम ने पूरी तरीके से भाजपा-शिवसेना के आगे नतमस्तक होकर उन्हें सत्ता सौंप दी। इतना ही नहीं, जब सोनिया अपनी बीमारी का इलाज कराने अमेरिका गई थी और राहुल भी साथ थे, उस समय भी अशोक-मोहन की मेहरबानी से 8 जिला अध्यक्षों को रातोंरात बदल दिया गया वो भी आलाकमान की अनुमति लिए बगैर। उस समय शोर तो बहुत बचा था और पार्टी के कार्यकर्त्ताओं की माने तो 50-50 लाख में जिले की सरदारी दी गई। उन पर आरोप यहां तक है कि अपने चंद गुर्गों के माध्यम से सूबे में पैसे वाले कार्यकर्त्ताओ की पहचान कर उनसे पैसों की मांग करते हैं। पैसे की उगाही तो खूब हुई मगर किसी को चंदे की रसीद तक नहीं मिली। अब आम कांग्रेसी के अड़ियल रूख को देखते हुए अशोक ने पैतरा भी बदल लिया।
उनकी मुंहबोली बहन के पति सुधीर मुनगंतीवार के इशारे पर कांग्रेस-एनसीपी का गठबंधन नहीं हुआ वरना नतीजे कुछ और होते। अशोक के देवेंद्र फड़नवीस दरबार में घुटने टेकने से उनके पिता के साथ जुड़े राजनेताओं में रोष है। नागपुर के महानगरपालिका चुनाव में जिस तरीके से उन्होंने पार्टी का नाश किया, जिस प्रकार टिकटों की बोली लगी तो पार्टी के कार्यकर्त्ताओं ने अशोक के मुंह पर कालिख तक पोत दिया था। इस पूरे घटनाक्रम का इल्जाम उन्होंने पूर्व मंत्री सतीश चतुर्वेदी नितिन राऊत और अनीस अहमद की तिकड़ी पर लगाया था। नागपुर नगरनिगम में कांग्रेसी उम्मीदवार बुरी तरह से पराजित हुए। नगरपालिका में जीतकर आए नेताओं पार्षदों में नेता सदन बनाने की होड़ में अशोक-मोहन की जोड़ी मात खा गई। नागपुर महानगरपालिका में उनके नामित पार्षद को सदन के नेता के रूप में मानने से इंकार कर दिया। कारण कांग्रेस के कार्पोरेटर ने एकमत से अपना नेता चुनकर सभापति को अवगत करा दिया। सभापति ने संख्या देखते हुए और पार्षदों की सहमति को मानकर ‘‘मनपा‘‘ में तानाजी वनवे को विपक्ष के नेता सदन के रूप में मान्यता दी। उनके साथ दो-तिहाई पार्षद थे जबकि अशोक चव्हाण मुत्तेमवार का साथ देते हुए संजय महाकालकर के पक्ष में थे। वे सभापति के फैसले से संतुष्ट नहीं हुए। चूंकि अशोक चव्हाण और मोहन प्रकाश की जोड़ी ने जिस आर्थिक व्यवहार के तहत संजय महाकालकर को बनाने का निर्देश पार्टी पर थोपा था, उसे सभापति ने नहीं माना। इस फैसले के खिलाफ इन दोनों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया लेकिन कोर्ट ने भी सदन में पार्षदों के द्वारा बहुमत से चुने गए नेता को मान्यता दी और तानाजी वनवे के पक्ष में लोकतंत्र का हवाला देकर सभापति के फैसले पर ही मोहर लगाई। इतना ही नहीं शहर अध्यक्ष विकास ठाकरे की चिट्ठी की मान्यता को रद्द कर किया। तिलमिलाए अशोक अब इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाकर अपनी फजीहत कराने को आमदा हैं।
नागपुर के कांग्रेसी नेताओं ने दिल्ली जाकर इस पूरे कार्यकलापों की जानकारी राहुल गांधी को दिया। इन नेताओं ने बताया कि कांग्रेस उपाध्यक्ष से यह अनुरोध किया गया है कि जल्द ही इन दोनों को नहीं हटाया गया तो सूबे में कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया हो सकता है, वहीं राहुल ने उनको सही कदम उठाने का भरोसा दिलाया है। देखा जाए तो अशोक के कारनामों से प्रदेश में उनका मजाक उड़ता रहा है। इससे पहले बल्लारशाह के हुए नगर चुनावों में उन्होंने तेलांगना के एक बिल्डर को पकड़ कर उसे शहर अध्यक्ष बनाया, फिर नगर अध्यक्ष का टिकट देकर उपकृत किया था। फिर क्या ये कांग्रेसी उम्मीदवार तीसरे नंबर पर पहुंच गए, आजकल उनके गुमशुदगी के पोस्टर आपको मिल जाएंगे। ऐसा नहीं है कि अशोक चव्हाण अकेले माल लेते रहे। वे राहुल दरबार में नागपुर के रहने वाले युवक अलंकार के माध्यम से घुसपैठ किए हुए हैं। उनके इशारे पर महाराष्ट्र के कांग्रेसी नेताओं को राहुल के दरबार में हाजिरी मिलती है। यह बातें अब आम है कि जो अलंकार की सेवा करता है, उससे मेवा मिलता है। अलंकार जैसे विशेषण से कुख्यात विदर्भ का यह नौजवान माल बटोर कर भी अशोक अच्छी-खासी संपत्ति अर्जित कर चुके हैं। राजनीति हलकों में यह चर्चा अब रोजमर्रा की बात है कि अलंकार के एकाउंट में टोकन गया और कांग्रेस युवराज से एपाइंटमेंट तय समझो। महाराष्ट्र से दिल्ली उतरने के पूर्व राहुल से मुलाकाती समय तय हो जाता है। ये बात और है कि कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गज सांसद, पूर्व मंत्रियों को भी महीनों राहुल के बंगले में एंट्री नहीं मिलती। और तो और अहमद-वोरा-द्विवेदी की तिकड़ी भी अलंकार के इस कमाल के आगे बेबस हैं।
अशोक चव्हाण का साउथ एवेन्यू स्थित सरकारी बंगला भी देश भर के एनजीओ की फंडिंग का केंद्र बना हुआ है। उनके निजी सचिव की हैसियत से सुरेश भोषीकर से इस बाबत बात की गई तो उन्होंने कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया। वहीं हमेशा वे रटा-रटाया बात कहते हैं कि साहब दिल्ली में नहीं है जबकि निजी मोबाइल पर अशोक भी आने से कतराते हैं। जानकारों की मानें तो भोषीकर अपने बॉस और उनके पिता के उपकृत बड़े अधिकारियों के माध्यम से एनजीओ की फंडिंग कराते हैं जिसका बड़ा हिस्सा इन भाई साहब को भी जाता है। अब जब बात आलाकमान के कानों तक पहुंच चुकी है तो जल्द ही उनकी विदाई हो सकती है। आदर्श मामले में अशोक का जेल जाना तय है ऐसे में देखना है कि फड़नवीस की कृपादृष्टि और वित्तमंत्री मुनगंतीवार की रिश्तेदारी कब तक उन्हें बचा पाती है ? जानकारी के अनुसार उनकी जगह बाला साहब थोराट को सूबे की कमान सौंपी जा सकती है। वर्तमान में थोराट गुजरात के स्क्रीनिंग कमिटी के चेयरमैन बनाए गए हैं। ऐसे संकेत भी मिले हैं कि राहुल उन्हें महाराष्ट्र की सरदारी सौंप सकते हैं और मुंबई कमिटी की तर्ज पर विदर्भ कांग्रेस कमिटी का गठन भी तय माना जा रहा है।
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