रितेश सिन्हा। कांग्रेस का संगठन चुनाव पूरी तरह से फर्जी एक्सरसाइज साबित होता जा रहा है। निर्वाचन आयोग द्वारा सूचना जारी किए जाने के बाद कांग्रेस ने संगठन चुनाव के लिए चुनाव प्राधिकरण का गठन किया था। प्राधिकरण के चेयरमैन के रूप में मुलापलि रामाचंद्रन की नियुक्ति की गई। उनके कामकाज में हाथ बंटाने के लिए शमशेर सिंह ढिल्लो और राजस्थान के अश्क अली टॉक को नियुक्त किया गया। मगर बाद में अहमद पटेल कांग्रेस अध्यक्ष के माध्यम से अपने मोहरे के रूप में गुजरात के राज्यसभा सांसद मधुसूदन मिस्त्री और असम से राज्यसभा सांसद भुवनेश्वर कालिता को सदस्य बनाने में सफल रहे। इसके पहले मिस्त्री यूपी से धकियाए गए थे, मगर भाई अहमद की धमक से चुनाव प्राधिकरण में घूस गए। फिर क्या था, बदतमीजी के लिए मशहूर हुए तुनक मिजाज मधुसूदन की सनक की वजह से पूरी कांग्रेस उसमें उलझ कर रह गई। एपीआरओ और डीआरओ के द्वारा बनाए गए लोगों की सूची को ध्यान से देखने पर पता चला कि जो खुद कभी डेलीगेट नहीं बन पाए वो डेलीगेट और एआईसीसी सदस्य बनाने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
इसका सीधा फायदा उठाते हुए अहमद की सलाह पर मिस्त्री अपने चेले-चपाटों के जरिए दिल्ली से डेलीगेट तक तय करवा रहे हैं। इस गड़बड़झाले से महाराष्ट्र, यूपी, बिहार, झारखंड और पंजाब में शिकायतों के अंबार लगे हुए हैं। बात जूतमपैजार और गाली-गलौच तक जा पहुंची है। महाराष्ट्र के पीआरओ बने महेश जोशी, जो अपने लिए कुछ अर्से पहले नौकरी का जुगाड़ ढूंढ रहे थे, वे आज डेलीगेट बनवा रहे हैं। टेलीफोन ऑपरेटर से एक समय सांसद बन बैठे प्रोपर्टी डीलर टाइप नेता पर गंभीर आरोप तक लगे हैं। कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय के प्रांगण से लेकर मुंबई, नागपुर तक इस नेता के द्वारा लेन-देन के किस्से आम चर्चा में हैं। कांग्रेस के संसदीय इतिहास में पहला ऐसा मौका होगा जब 5 लाख 80 हजार से भी अधिक वोटों से लोकसभा चुनाव हारने वाले इस पराजित यौद्धा को पार्टी उपाध्यक्ष की आंखों में धूल झोंकते हुए महाराष्ट्र जैसे बड़े प्रदेश का पीआरओ बना दिया गया। इसका परिणाम है कि सूबे में डेलीगेट, जिला और शहर अध्यक्ष की बोली लगाई गई। सूबे के कई नेताओं ने बातचीत में बताया कि नाटे कद के ये राजस्थानी कलाकार अपनी खास तरह की राजनीति के लिए जाने जाते हैं। चुनाव प्राधिकरण के अहम सदस्य मिस्त्री उनकी सत्कार का लाभ उठाते हुए मुंबई की रंगीनियों का सैर कई बार कर चुके हैं।
कमाल देखिए पृथक विदर्भ की क्षेत्रीय कांग्रेस के गठन को लेकर नागपुर क्षेत्र के कई पूर्व मंत्री और नेता ने कुछ दिन पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व उनके राजनीतिक सलाहकार बने अहमद पटेल और चुनाव प्राधिकरण के अधिकारियों से मिलकर अपनी बात रखी थी। इन सभी ने उन नेताओं को आश्वस्त किया था कि मुंबई की तर्ज पर ही पृथक विदर्भ में क्षेत्रीय कांग्रेस गठित की जाएगी। मगर एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत नागपुर क्षेत्र के किसी भी नेता को प्रतिनिधि नहीं बनाया गया और प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौहान के चहेते को गढ़चिड़ौली जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र से डेलीगेट बनाया गया। ऐसा करके प्रदेश के पीआरओ महेश जोशी ने अपना टिकट तो पक्का कर लिया और उन्होंने राजस्थान के प्रभारी व पूर्व सांसद अविनाश पांडे और अशोक चव्हान खेमे के सात बार सांसद रहे विलासराव मुत्तेवार को भंडारा जिले से डेलीगेट बनवा दिया। खास बात तो देखिए अविनाश पांडे नागपुर संसदीय क्षेत्र से एक बार और सात बार के सांसदी में विलासराव दो बार इस क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं। महेश जोशी ने ऐसा करके यह संदेश जरूर दे दिया कि इन दोनों नेताओं की हैसियत उनके पहले के संसदीय क्षेत्र नागपुर से भी डेलीगेट बनने की नहीं है। जहां से जनता से वे चुनकर नहीं आ सकते, वहीं से उन्हें डेलीगेट्स बनवा कर उनकी औकात बता दी। आपको यह भी बता दें कि अविनाश पांडे वर्तमान में एआईसीसी में महासचिव के पद पर काबिज हैं, जबकि विलासराव मुत्तेवार एआईसीसी वर्किंग कमिटी के सदस्य हैं। अगर इनको जिम्मेदारी देनी भी थी तो बेहतर होता कि उनके पुराने संसदीय क्षेत्र नागपुर से दिया जाता ताकि विदर्भ का प्रतिनिधित्व संगठन को मिलता, मगर इन दोनों को भंडारा से डेलीगेट्स बनाया जाना एक खास रणनीति के तहत किया गया है जिसमें विदर्भ के नेतृत्व को नकारने के साथ-साथ राजस्थान की एक खास जाति के प्रभुत्व को बढ़ाना भी शामिल है।
मगर राजनीति में सबकुछ एकसमान नहीं चलता। राजनीति के चतुर खिलाड़ी मुत्तेवार ने स्थिति को भांपते हुए अपने भाषण के आखिरी क्षण में सबको धत्ता बताते हुए अलग विदर्भ प्रदेश का नारा लगा ही दिया। आपको बता दें कि अशोक चव्हान ने नागपुर कार्पोरेशन चुनाव में टिकट बांटने से लेकर नेता सदन बनाने और मनोनित सदस्य बनवाने की लड़ाई में अपना मुंह काला करवाने के बाद सूबे की तिकड़ी सतीश चतुर्वेदी, नितिन रावत और अनीस अहमद से पार्टी और कोर्ट के माध्यम से हार चुके हैं। इसी हार का बदला चव्हान ने पीआरओ महेश जोशी के माध्यम से अपने विरोधी खेमे के नेताओं को मात देने की पूरी कोशिश की है। अशोक विरोधी खेमा राहुल की अध्यक्ष पद की ताजपोशी तक अपने खास मकसद से चुप्पी साधे हुए है। उसके बाद महाराष्ट्र में आर-पार की लड़ाई देखने लायक होगी। अशोक के खिलाफ इस लड़ाई में कांग्रेस के कई नेताओं का समर्थन भी हासिल है। इसी बीच संगठन चुनाव के फर्जीवाड़े के बीच कांग्रेसी खेमे के लिए खुशी की खबर महाराष्ट्र से ही आई है। सूबे के परभनी, नांदेड़ के महानगरपालिका चुनाव में पार्टी को 81 में से 71 सीटों पर जीत हासिल हुई। ये भारी बहुमत इस बात की पुष्टि के लिए काफी है कि देश भर में हो रहे निकाय चुनावों में लगातार कांग्रेस को मिल रही बढ़त एक बड़े बदलाव का संकेत दे रही है। आपको बता दें कि परभनी, मालेगांव और नांदेड़ में 40 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम और अल्पसंख्यक समाज के लोग रहते हैं। केंद्र की मोदी और प्रदेश की फड़नवीस सरकार की नीतियों से तंग आकर और ओवैसी के एमआईएम की मौजूदगी के बावजूद भी कांग्रेस को मिली ये भारी जीत आने वाले गुजरात और हिमाचल के विधानसभा चुनावों में टॉनिक का काम करेगी।
कांग्रेस के युवराज अपनी राजनीतिक यात्रा के दौरान देश के अल्पसंख्यकों के साथ-साथ बहुसंख्यक समाज का भी दिल जीतने में कामयाब हो रहे हैं। जिस तरीके से केदारनाथ की पैदल यात्रा के बाद राहुल ने मंदिर पालिटिक्स के साथ पेशेवर युवाओं, किसानों, छात्रों, व्यापारियों, बेरोजगार युवाओं से जुड़े मुद्दों को बड़ी संजीदगी के साथ देश-विदेश में उठाया है, उससे न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ा है, बल्कि उनकी आक्रामक शैली अपना असर भी धीरे-धीरे दिखा रही है। आम कांग्रेसी भी कांग्रेस उपाध्यक्ष के इस नए तेवर से खासे उत्साहित हैं। भले ही महाराष्ट्र के इस निकाय चुनाव में अशोक चौहान जीत का सेहरा अपने सिर पर बांध रहे हैं, मगर वे शायद ये भूल गए कि उनके नेतृत्व में उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से पूरे महाराष्ट्र में कांग्रेस पूरी तरह से तबाह हो गई। उनकी वजह से भाजपा और शिवसेना गठबंधन को सत्ता मिली। भले ही इस जीत के बाद अपनी पीठ थपथपाए, मगर महाराष्ट्र और देश के केंद्रीय कांग्रेसी नेता अच्छी तरह जानते हैं कि इस विजयश्री का मुख्य श्रेय केवल राहुल को जाता है। वरना सूबे में अशोक और मोहन प्रकाश की जोड़ी आज भी टिकट बेचने से लेकर पद बांटने के नाम पर कांग्रेसी कार्यकर्त्ताओं को लूटने के गंभीर आरोप का कोई ठोस और संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी है। इस जीत के पीछे राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद की भूमिका भी अहम है। वे अघोषित रूप से सूबे के प्रभारी के तौर पर महाराष्ट्र में अशोक चव्हान के खिलाफ लोगों को भी पार्टी हित में एक करने में कामयाब रहे हैं। मोहन प्रकाश की भूमिका अब तो 24 अकबर रोड के उनके डब्बेनुमा आफिस में बंद हो चुकी है। राहुल के निर्देश पर सूबे में पिछले 6 महीने में आजाद की बढ़ी सक्रियता का परिणाम रहा कि मुस्लिम प्रभाव वाले क्षेत्रों नांदेड़, परभनी और मालेगांव में कांग्रेसी खेमे को अप्रत्याशित जीत मिली, वहीं भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे चव्हान के आचरण से पार्टी कार्यकर्त्ता में खासा रोष देखा जा सकता है। आजाद के इस काम को पार्टी आलाकमान ने भी सराहा है। महाराष्ट्र के कांग्रेसियों में उनकी सक्रियता से खासा उत्साह है और आने वाले समय में उनको कई अहम जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।
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