रितेश सिन्हा। 70 सालों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भले ही महिलाओं ने अपनी सफलता का परचम लहराया है, मगर वास्तविकता कुछ और ही बयां करते हैं। महिला आरक्षण के नाम पर तमाम राजनीतिक दल आधी आबादी को केवल झुनझुना थमाते आए हैं। कांग्रेस हो या भाजपा या फिर अन्य दल, कोई इससे अछूता नहीं। इन्हीं दलों ने केवल वोट बैंक के चलते अब तक संसद में आरक्षण विधेयक पास तक नहीं होने दिया। एक बार फिर से महिला आरक्षण का जिन्न बोतल से बाहर निकला है। अबकी बार कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शारदीय नवरात्र के मौके पर चिट्ठी लिखकर संसद में महिला आरक्षण विधेयक को पास करने का अनुरोध किया है। सोनिया लिखती हैं कि 9 मार्च 2010 को राज्यसभा में इस विधेयक को पास कर दिया गया था मगर लोकसभा में किसी न किसी कारण से अब तक पास नहीं हो सका। आप बहुमत की सरकार चला रहे हैं, अगर आप इस विधेयक को पास करते हैं तो कांग्रेस भी आपका समर्थन करेगी। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी महिलाओं की राजनीति में भागीदारी का समर्थन किया था। वहीं संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी एक रिपोर्ट में भी महिला आरक्षण की वकालत की गई थी। इस रिपोर्ट को दिल्ली में तत्कालीन केंद्रीय वाणिज्य व व्यापार मंत्री और वर्तमान में रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने जारी किया था।
1996 में तत्कालीन देवेगौड़ा सरकार ने इस विधेयक को संसद में पेश किया था। देवेगौड़ा सरकार के कार्यकाल के दौरान विवाद के बाद इस विधेयक को संसद की एक संयुक्त समिति के हवाले कर दिया गया। 1998 में वाजपेयी सरकार ने इसे दोबारा लोकसभा में पेश किया। उसके बाद वर्ष 1999, 2002 और 2003 में इसे फिर पेश किया गया। मजेदार बात है कि भाजपा, कांग्रेस और वामदल खुले तौर पर इस विधेयक का समर्थन करते रहे हैं, मगर अभी तक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। इसी बीच कांग्रेस की महिला विंग में बदलाव नजर आने लगे हैं। सुष्मिता देव को अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष की कमान दी गई है।
देखा जाए तो कांग्रेस में महिला नेतृत्व रसूखदारों को दिया जाता रहा है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुत्री इंदिरा गांधी के हाथों यह पहली बार आया। उसके बाद इंदिरा नेहरू परिवार की विरासत के रूप में सूचना प्रसारण मंत्री बनाई गईं। वे प्रधानमंत्री भी बनीं और कांग्रेस अध्यक्ष और महिलाओं के प्रतिनिधि के तौर पर पार्टी की सर्वेसर्वा बनकर उभरी। आज उसी कांग्रेस की कमान संभालने वाली सोनिया गांधी इसी विरासत की एक कड़ी के रूप में देखी जा सकती है। विदेशी मूल का होने के बाद भी इंदिरा की बहू, राजीव गांधी की पत्नी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मां होने के नाते वे आज देश की सर्वश्रेष्ठ महिला हैं। उन्होंने अपने जीवन में त्याग भी बहुत किया, जब कभी भी मौका आया तो देश के लिए सर्वस्व भी न्यौछावर किया। उनके त्याग को कमतर करके नहीं आंका जा सकता। अब जब सुष्मिता देव को महिला कांग्रेस की नई सूबेदारनी बनाया गया है तब भी सबसे बड़ी योग्यता उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि है। असम के होने के बाद भी अधिकांश समय उन्होंने दिल्ली में बिताया है। असम के सिलचर से सांसद बनी सुष्मिता का यह क्षेत्र उनके पिता और दिग्गज नेता संतोष मोहन देव का निर्वाचन क्षेत्र रहा है। राजनीतिक रसूख की वजह से जहां उन्हें एनएसयूआई से छात्र संघ का चुनाव लड़ने का मौका दिया गया, वहीं पिता की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए सिलचर से पार्टी ने चुनाव टिकट भी दिया। सुष्मिता राहुल के मित्र मंडली की महिला सदस्य हैं जिसका लाभ उन्हें मिला। सांसद तो वो हैं हीं। अब तक उनकी पहचान नेता-पुत्री के तौर पर रही है। पिता की मृत्यु के बाद सांत्वना के रूप में कांग्रेस कार्यकारिणी और पार्टी अध्यक्ष के आशीर्वादस्वरूप नई जिम्मेदारी देते हुए उन्हें महिला कांग्रेस की कमान दे दी गई। इससे पहले शोभा थामस विगत तीन सालों से अध्यक्ष पद की कमान संभाल रही थी। शोभा थामस के रूप में एनएसयूआई में शामिल होने वाली इस महिला नेत्री को तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज और माग्रेट अल्वा ने राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। शोभा थामस से शोभा ओझा में बदल चुकी इस राजनेत्री को कई बार विधानसभा चुनाव में भाग्य आजमाने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने अवसर दिया और चुनाव दर चुनाव अपनी जमानत जब्त कराकर पार्टी की फजीहत ही करती रही। फिर भी इनको टिकट मिलता रहा क्योंकि एआईसीसी के अंदर क्रिश्चयन कांग्रेस कमिटी भी उनकी दावेदारी में हमेशा सक्रिय दिखी और सोनिया के आने के बाद इस लॉबी का दखल भी पार्टी में बढ़ा। हद तो तब हो गई जब इंदौर के नगर निगम चुनाव में लड़ने के लिए शोभा ओझा कूद पड़ी और खुद को राष्ट्रीय स्तर की नेता समझने वाली जमानत तक जब्त कराकर लौटी। मगर इनका ईनाम हर हाल में तय था क्योंकि पार्टी को बहुत मजबूत कर रही थी। फिर क्या था, इनामस्वरूप महिला कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया। किस्सा यहीं पर खत्म होता। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साथ छत्तीसगढ़ के राज्यसभा सीट पर उन्होंने दावा ठोक दिया। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मोहसिना किदवई का टिकट तो कटवाने में सफल रही, मगर उनका उभरना कांग्रेस के मुस्लिम लीग के नेताओं को यह नागवार गुजरा। ये नेता राहुल को समझाने में भी कामयाब रहे और ओबीसी समाज की एक महिला नेता, जो विधानसभा चुनाव में भी बुरी तरह पराजित हुई थी, उसे राज्यसभा सीट मिली। दिग्विजय की करीबी माना जाने वाली छाया वर्मा को राज्यसभा पद से नवाजा गया और वे सांसद तक बन गई। कल कांग्रेस मुख्यालय में पहली बार एक अनोखा नजारा नजर आया। पांच महिला नेताओं ने बकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर कांग्रेस पार्टी के महिला सशक्तिकरण की बात बड़े ही संजीदा तरीके से उठाई, मगर इसमें छाया वर्मा दिखाई नहीं दी। महिलाओं की पंचायत में उनको जगह तक नहीं मिली। कारण दिग्गी के सितारे गर्दिश में हैं और वे महज कागजी महासचिव बनकर रह गए हैं। एक और मुखर सांसद रंजीता रंजन को भी दरकिनार कर दिया गया। वे भी इस मीटिंग में शामिल नहीं हुई। इस मुखर सांसद ने महिला कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए भी अपना दावा ठोका था। रंजीता चुनाव तो जीत जाती हैं, मगर उनका रसूख मजबूत नहीं है। इस मीटिंग में शामिल नहीं होना कई सवालों को भी जन्म देता है। इस मीटिंग में खुशबू शामिल थी। वो दक्षिण भारत की बड़ी अदाकारा हैं और उनकी लंबी-चौड़ी फैन फोलोइंग भी है। कांग्रेस ने इस अभिनेत्री का लाभ भी चुनावों में लिया है। मगर एक और अभिनेत्री से नेत्री बनी नगमा को भी नजरंदाज किया गया। वे भी रंजीता की तरह राष्ट्रीय अध्यक्ष का दावा ठोक रही थी। मंचासीन शर्मिष्ठा मुखर्जी कांग्रेस के दिग्गज रहे और पूर्व महामहिम प्रणब मुखर्जी की बेटी हैं और इसका लाभ भी उन्हें मिला है। बड़े-बड़े दावों के साथ चुनाव में उतरी शर्मिष्ठा को राष्ट्रपति भवन भी चुनाव जिताने में जुटा था, मगर लोकतंत्र में तो जनता ही जनार्दन होती है और हुआ भी ऐसा। रायसीना हिल्स से सीधे चुनाव मैदान में कूदने वाली शर्मिष्ठा की उसी जनता-जर्नादन ने जमानत जब्त कर मैदान में चित करके भेज दिया। इस मंच पर प्रियंका चतुर्वेदी भी दिखाई दी। ‘प्रयास‘ के प्रयास के बाद गुरूदास कामत से राजनीति का ककाहरा सीखने वाली प्रियंका भले ही मुंबई में रहती हैं, मगर उनका संबंध यूपी से रहा है। किसी जमाने में गुरूदास का पीआर देखने वाली प्रियंका आज कांग्रेस की स्टार वक्ता हैं। कुछ महिला नेताओं का कहना है कि कि कांग्रेस के राष्ट्रीय महिला संगठन में उन जूझारू नेताओं को सम्मान नहीं मिलता जिनकी बड़ी राजनीतिक रसूखदारी न हो। गुजरात की शोभना शाह महिला कांग्रेस की वो चाबी हैं जो संगठन को बड़ा मजबूत करने का काम करती हैं। हर राष्ट्रीय अध्यक्ष उनकी सेवाएं लेती रही हैं क्योंकि जिला अध्यक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक बनाने की डील गोल्फ लिंक स्थित इनके आवास पर होती है। शोभना का पद भले ही छोटा है, मगर काम और कारनामे बहुत बड़े। सोनिया के राजनीतिक सलाहकार अहमद ‘भाई‘ को वो अपना दबदबा दिखाती रही हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो महिला सशक्तिकरण की अच्छी सोच के साथ सोनिया ने जो पहल की, उसी सोच को आगे बढ़ाते हुए सांसद सुष्मिता देव तो अच्छी शुरूआत कर रही है, लेकिन वो इसे चला पाएंगी, इसमें संदेह है। चुनौती बड़ी है। सांसदी तो विरासत में मिली, मगर एनएसयूआई में इनकी कोई छाप नहीं रही। महिला कांग्रेस का पद भी चुनौती से भरा हुआ। सुष्मिता इस दायित्व को कैसे निभाएंगी, कैसे सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व दे पाएंगी, ये तो आने वाला कल बताएगा।
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