धनंजय गिरि, स्वराज ब्यूरो | अपने तीन साल के कार्यकाल में जिस प्रकार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशों का दौरा किया है और भारत के कूटनीति का लोहा मनवाया है, वह अप्रतिम है। यही कारण है कि जो देश भारत को इससे पूर्व तवज्जो नहीं देते थे, वे भारतीय प्रधानमंत्री के आगमन की प्रतीक्षा करते रहते हैं। कूटनीति के माहिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से भारत की विदेश नीति दुनिया पर हावी होती दिख रही है। पाकिस्तान और चीन जैसे पडोसी देशों को भी भारत की कूटनीति के आगे मुंह की खानी पड रही है। सार्क देशों को तो अपने शपथ ग्रहण समारोह में ही साध लिया। उसके बाद कई अमेरिका सहित यूरोपीय देशों में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई। अब तीन दिवसीय इज्ररायल यात्रा के जरिए पूरी दुनिया को यह संदेश देना चाहते हैं कि भारत आज भी “वसुधैव कुटुम्बकम्” के सूत्रवाक्य को आत्मसात किए हुए है।
इस बात को पूरी दुनिया जानती है कि नरेंद्र मोदी से पहले किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने इज्ररायल की धरती पर कदम नहीं रखा है। करीब 25 साल पहले इजराइल के साथ कूटनीतिक संबंध शुरू करने वाले उस समय के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव भी इजराइल नहीं गए थे। तीन दिन की अपने ऐतिहासिक यात्रा पर रवाना होने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वे दोनों देशों की साझा चुनौती आतंकवाद से लड़ना है और वे इस पर चर्चा करेंगे। वे इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से आतंकवाद जैसी समान चुनौतियों और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा करेंगे।
कब किसके साथ संबंधों को कितना और कैसे प्रगाढ बनाया जाए, इसको बेहतर तरीके से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जानते हैं। इज्ररायल से बेहतर और मजबूत संबंध बने, इसलिए नरेंद्र मोदी ने तेल अवीव और यरुशलम की यात्रा के साथ फिलस्तीन जाने का कार्यक्रम नहीं बनाया। सामान्यतः विश्व नेता अरब-इजराइल संबंधों के प्रति अपने देश के रुख में संतुलन बनाने के प्रयास में इजराइल और फिलस्तीन की यात्राएं साथ-साथ करते हैं। लेकिन मोदी बेलाग संदेश देना चाहते हैं कि उनकी प्राथमिकताओं में इजराइल प्रमुख है। यह भारतीय जनता पार्टी की पुरानी नीति के अनुकूल है। प्रधानमंत्री की यात्रा से इजराइल को साफ संदेश मिलेगा कि ‘हम आपके सहभागी हैं।’ इस यात्रा में आतंकवाद चर्चा का प्रमुख मुद्दा रहेगा। दरअसल, भारत-इजराइल संबंधों में युगांतकारी परिवर्तन तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल में आया। 1992 में दोनों देश विलगाव के पुराने दौर से निकलकर सहयोग के रास्ते पर चले। 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से इस सफर की रफ्तार खासी तेज हो गई है। जाहिरा तौर पर इसका कारण मोदी और उनकी पार्टी का वैचारिक रूझान है। इस गति को बढ़ाने के प्रयास में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 2015 में इजराइल की यात्रा की थी। दोनों देशों के लो प्रोफाइल संबंधों को सतह पर लाने की दिशा में यह महत्त्वपूर्ण मुकाम था। मोदी का दौरा उस सतह पर चकाचैंध रोशनी करने का प्रयास है। इसके साथ ही भारतीय विदेश नीति में परिवर्तन का वो सिलसिला भी अपनी मंजिल पर पहुंचेगा, जिसके तहत मोदी सरकार ने अमेरिकी धुरी से भारत को जोड़ने में अपनी पूरी ताकत लगाई है।
और तो और, मोदी की सबसे सफल योग डिप्लोमेसी के आगे दुनिया भर के देशों को झुकना पड रहा है। वे अपने योग डिप्लोमेसी के जरिए न केवल अंतर्राष्ट्ीय मंच पर बल्कि घरेलू राजनीति में भी वर्चस्व स्थापित करने में सफल हुए। बीते 21 जून केा अंतर्राष्ट्ीय योग दिवस पर पाकिस्तान, चीन, जापान और अमेरिका समेत 175 देशों में योग कार्यक्रम आयोजित किए गए। यह अनायास नहीं है कि कई विदेशी मामलों के जानकार भी कहने लगे हैं कि फिलहाल मोदी की योग डिप्लोमेसी सबसे सफल विदेश नीति है।
गौर करने योग्य यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी की अनगिनत उपलब्धियां, विश्व के मंच पर भारत की बढ़ती साख और विश्वभर के व्यापारी वर्ग के लोगों का भारत में निवेश को लेकर बढ़ता विश्वास पूरी दुनिया के लिए भले ही खुशी की बात हो लेकिन इससे भारत के दो पड़ोसी देश सकते में हैं। जी हां आप ठीक समझ रहे हैं पाकिस्तान और चीन। इन दोनों देशों में एक के साथ भारत की शत्रुता विश्व पटल पर छिपी नहीं है तो वहीं दूसरे के साथ भी एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ दोनों के बीच जारी है। प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता संभालने के बाद से ही ये दोनों देश जिस तरह से निशाने पर आए उसने इन दोनों देशों की जमीन हिला कर रख दी। चीन पहले से ही वैश्विक रूप से मजबूत हो रहे भारत की गति को रोकने का प्रयास कर रहा था जो उसने और तेज कर दी तो वहीं पाकिस्तान की तरफ से आतंकी गतिविधियों में बढ़ोतरी हो गई। आश्चर्य की बात तो यह है कि मोदी के कूटनीतिक ताकत की वजह से विश्व की मीडिया उनकी तुलना ऑटोमन बिस्मार्क (ओटो फॉन बिस्मार्क) से करने लगी है। हम आपको ऑटोमन बिस्मार्क के कुछ बेहद ही महत्वपूर्ण संदेश बता दें तो आप खुद ही मान लेंगे की आकिर क्यों प्रधानमंत्री मोदी और बिस्मार्क की तुलना करने से विश्व की मीडिया परहेज नहीं करती है। ऑटोमन बिस्मार्क ने कहा था कि सबसे महत्वपूर्ण बात इतिहास रचना है, न की इतिहास लिखना। ऐसी हीं कुछ सोच प्रधानमंत्री मोदी की कार्यशैली में भी झलकती है और उन्होंने कई बार अपने अभिभाषण में इसका जिक्र भी किया है। बिस्मार्क ने कहा था राजनीति करना किसी खूबसूरत कला की तरह है। जो प्रधानमंत्री मोदी के काम करने के तरीके से साफ नजर आता है। बिस्मार्क ने एक बार कहा था मुर्ख गलती से सीखता है, समझदार दुसरों की गलती से। किसी कार्य को करने के लिए जो प्रिंसिपल बनाए गए है, अगर आप उन्हें सच समझ रहे हैं तो मतलब है कि आप कभी उस काम को प्रैक्टिकल रूप देने का प्रयास नहीं करेंगे। वह अपनी योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए खुद प्रयासरत रहते हैं। बिस्मार्क ने अपने वक्तव्य में एक बार कहा अच्छे, सच्चे, ईमानदार व्यक्ति के साथ और ज्यादा अच्छे तरीके से, पूरी सच्चाई के साथ और ईमानदारी से पेश आइए। एक धोखेबाज व्यक्ति के साथ उससे भी ज्यादा धोखेबाजी करिये। यही काम प्रधानमंत्री मोदी पाक और चीन के साथ कर रहे हैं। जिसका उदाहरण है अमेरिका के साथ समझौता करके चीन और पाकिस्तान को झटका देना। बिस्मार्क ने कहा था राजनीति को विज्ञान कहना बिलकुल सही है। उन्होंने इसी में आगे कहा था राजा शासन तो करता है, लेकिन हुकूमत नहीं करता है।
यही सिद्दांत मोदी का है वह भी कहते रहे हैं वह चैकीदार बने रहना चाहते हैं ताकि देश की जनता की सेवा कर सकें। बिस्मार्क ने कहा था जो घटनाएं हो रही है, मनुष्य उन्हें बदल नहीं सकता, लेकिन उनके साथ आगे बढ़ जरूर सकता है। इसी सिद्धांत के साथ प्रधानमंत्री मोदी हर दिन देश के विकास की नई इबारत लिखने की एक बेहतरीन कोशिश करते नजर आते हैं। एनएसजी में जिस तरह से चीन-पाकिस्तान ने भारत का रास्ता रोका था, उसकी कीमत अब जाकर दोनों को समझ में आ रही है। जब जर्मनी के प्रधानमंत्री बिस्मार्क ने अपने समय की बड़ी ताकतों-ऑस्ट्रिया, फ्रांस, रूस और इंग्लैंड को एक-दूसरे खिलाफ साधा था, ठीक उसी तरह की राजनीति और कूटनीति आजकल देखने को मिल रही है भारत-चीन और पाकिस्तान के बीच। पाक और चीन की बेचैनी का कारण आपको मोदी के किए गए कुछ समझौतों की वजह से बढ़ती नजर आ रही हो।

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