रितेश सिन्हा। कांग्रेस में फर्जीवाड़ा के खेल ने पार्टी आलाकमान को अहसज स्थिति में ला खड़ा किया है। बिहार में फर्जी चिट्ठी का खेल अभी उजागर ही हुआ था कि इतने में महाराष्ट्र में संगठन चुनाव के बहाने फर्जी चुनाव तक करवा लिए गए। इस मदारी और जमूरे के खेल में कुछ नेताओं ने अपनी सियासत कुछ दिनों के लिए भले ही चमका ली हो, मगर अंत में उनका राजनीतिक रूप से धाराशाही होना तय है। बिहार में फर्जी चिट्ठी के जरिए कार्यकारी अध्यक्ष तक बना दिए गए, लोगों से बधाइयां भी ले ली, मगर पार्टी हाईकमान को इसकी भनक तक नहीं लगी। जब इसकी सूचना कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को हुई तो इसकी जांच के आदेश दिए गए हैं। इसी बीच महाराष्ट्र में कांग्रेस भी प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौहान, प्रभारी मोहन प्रकाश और महेश जोशी की तिकड़ी ने जिस प्रकार खेल शुरू किए हैं, उसने नारायण राणे जैसे दिग्गज तक को पार्टी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। हालात ऐसे हो गए हैं अशोक चौहान अपने सूबे की सूबेदारी बचाने के लिए महेश जोशी के जरिए काले कारनामों को अंजाम दे रहे हैं। इस आर्थिक सांठगांठ में जिला अध्यक्षों की पदों की बोली लग रही है।
हाल में विदर्भ में ऐसे कई फर्जी खेल का पता चला जिसमें सूबे के पीआरओ द्वारा डीआरओ को विश्वास में लेकर मुंबई में बैठकर ही जिला और शहर अध्यक्ष तक तय किए जा रहे हैं। हद तो तब हो गई जब विदर्भ के चंद्रपुर जिले की सीमा में घुसे बगैर गढ़चिड़ौली से फैसले का फरमान सुना दिया गया। इसके लिए पहले ब्लॉक के लिए बीआरओ बनाए गए। चुनाव की पूर्व संध्या पर इन बीआरओ को 12 घंटे से भी कम समय में नागपुर पहुंचने को कहा गया। इतने कम समय में यूपी और बिहार से बीआरओ का चंद्रपुर पहुंचना हवाई यात्रा के द्वारा भी संभव नहीं है। केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण द्वारा नियुक्त किए गए चंद्रपुर जिले के लिए आगरा, यूपी के मधुसूदन सिंह और गया, बिहार के रजनीश कुमार, ये दोनों डेलीगेट भी हैं, ने डीआरओ और जिलाध्यक्ष के खिलाफ प्राधिकरण अध्यक्ष मधुसूदन मिस्त्री को शिकायती पत्र दिया जिसमें चंद्रपुर में हो रही आर्थिक लेन-देन के व्यवहार के साथ पूरी घटनाक्रम की जानकारी दी गई है। 23 सितंबर को संपन्न एक शहर से दूर इंटक भवन में बैठकर पूरे जिले की चुनावी कार्यवाही को एक घंटे में अमलीजामा पहना दिया गया। वहीं जिले के जिला चुनाव अधिकारी रामगोपाल बावनिया ने दूरभाष पर बताया कि वे स्वयं सर्किट हाउस में बैठे हैं। जिस दिन चुनाव होना था, उस दिन सुबह कांग्रेस के पार्षद संजय मारडोले की मृत्यु हो गई जिसकी वजह से स्थानीय कार्यकर्त्ताओं ने उस दिन चुनाव टालने का अनुरोध किया था। मगर जोशी और बावनिया की जोड़ी ने दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि देना तो दूर, चुपचाप चुनाव करवा कर कब निकल लिए, पता ही नहीं चला। इससे पहले पनवेल के डीआरओ को चंद्रपुर और गढ़चिड़ौली में डीआरओ बनाया गया।
स्थानीय कांग्रेसियों का यहां तक कहना है कि डीआरओ बावनिया बड़े शौकीन मिजाज हैं। शराब और शवाब के शौकीन बाबरिया की आंखें अंधेरा होते ही चौंधिया जाती हैं, वहीं सूबे के पीआरओ महेश जोशी दिल्ली में बैठकर सारा कारोबार देखते हैं। मुंबई पहुंचकर जोशी खुद को जयपुर में बीमारी का बहाना बनाकर लोगों को गुमराह भी कर रहे हैं। इस फर्जीवाड़े का अंदाज तो देखिए कि एआईसीसी में उनके द्वारा दिए गए मोबाइल नंबर पर चार-पांच बार संपर्क करने के बाद ही दूसरे तरह से एक जवाब मिला यह किसी जयपुर के बिजली विभाग के बलबंत का नंबर है। आपको बता दें कि महेश जोशी पुराने टेलीफोन आपरेटर रहे हैं। कांग्रेस का एक दौर ऐसा भी था जब जयपुर के संसदीय सीट पर उनका कोई उम्मीवार विजय पताका नहीं फहरा सका था। कांग्रेस लगातार चुनाव दर चुनाव अपने उम्मीदवारों को बदल रही थी। उस दौरान दिग्गज नेता हरिदेव जोशी का भतीजा बताकर महेश जोशी ने टिकट हासिल किया और जीतकर सांसद भी बन गए। आज वही जोशी जी उसी कांग्रेस को पानी पीकर भी कोसते हैं क्योंकि उनके बाहर तख्ती पूर्व सांसद की लगी हुई है और कहते हैं कि अच्छी-खासी नौकरी कर रहा था, अब तो पेंशन में गुजारा बड़ी मुश्किल से होता है। महेश जोशी की भाग्य का ठीकरा तब फूटा जब बिहार के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अनिल शर्मा और पंजाब के सांसद प्रताप बाजवा ने इंकार कर दिया। फिर क्या था जयपुर की सड़कों पर शौकिया निक्कर पहनकर निकलने वाले जोशी पीआरओ बना दिए गए। उसके बाद देश की आर्थिक राजधानी और रात की चमकने वाली मुंबई में हर तरह का सुख भोगने वाले इस नेता ने प्रदेश अध्यक्ष अशोक चव्हान के खिलाफ उठने वाले तूफान को रोकने का ठेका ले लिया। ये वहीं महेश जोशी हैं जो कई बार सार्वजनिक तौर राहुल के लिए ऐसे शब्द का प्रयोग कर चुके हैं, जिसकी कल्पना आम कांग्रेसी कभी नहीं कर सकता। ‘पप्पू‘ कहने वाले ये नेता उसी कांग्रेस उपाध्यक्ष के नाक के नीचे कांग्रेस को पप्पू बना रहे हैं।
पूरे शहर और जिला अध्यक्ष के लिए अच्छी-खासी रकम भी वसूली की खबरें हैं। इसी तरह डीआरओ ने भी माल के बदले काम की तर्ज पर चव्हान की पसंद के आधार पर लोगों को चुनना शुरू कर दिया। इस पूरे माल के खेल की मोबाइल, वीडियो रिकार्डिंग और स्थानीय लोगों की शिकायत का पूरा कच्चा चिट्ठा आलाकमान तक पहुंचा दी गई है। इसकी शिकायत केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण के पास भी भेजी गई। इस शिकायती पत्र में यह भी जिक्र किया गया है कि पीआरओ और डीआरओ दो मिनट की दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि देने के लिए उपस्थित होते। इस नेता की अंतिम यात्रा में उमड़ी 40000 लोगों की भीड़ को 4 घंटों का समय लगा, मगर डीआरओ, जिलाध्यक्ष और शहर अध्यक्ष तक अंतिम यात्रा में शामिल होने का वक्त नहीं मिला। चुनाव का पूर्व सांसद नरेश पुगलिया समर्थकों ने पुरजोर विरोध भी किया। इन समर्थकों ने डीआरओ से आम कांग्रेसियों से मिलकर मुद्दे को सुलझाने की बात की थी, मगर इन साहब तो वहां जाना भी मुनासिब नहीं समझा।
आपको बता दें कि इस पूरे माल के खेल में राजस्थानी कनैक्शन सामने उभकर आ रहा है। बिहार मामले में राजस्थान के सीपी जोशी के आर्थिक लेनदेन की बातें चर्चा में आम है, वहीं अब इसी सूबे के महेश जोशी और डीआरओ रामगोपाल बावनिया जो भले वर्तमान में झारखंड निवासी हों, मगर उनकी जड़ें राजस्थान में बसी हुई है। क्या इसे राजस्थान की मिट्टी का असर कहें कि सिंचाई के लिए तरस रहे इस सूबे के नेता माल की खिचाई कर अपनी आर्थिक सिंचाई जरूर मजबूत कर ली है। महाराष्ट्र में अशोक चव्हान के मंत्रीमंडल के नौरत्नों में एक विजय वडेतीवार भी रहे हैं जो भाजपा के चहेते हैं। सिचाई मंत्री रहते उन्होंने सिचाई के लिए मालों की खिचाई भी थी, इन पर आरोप है कि राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान उन्होंने एनडीए समर्थिक उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग करवाई थी जिसके इनामस्वरूप उन्हें सूबे में उपनेता पद से भी नवाजा गया और मंत्री का दर्जा दृभी दिया गया। ये अपने आप में भाजपा से वडेतीवार के सांठगांठ को भी बताता है। कांग्रेस में रहते हुए ये नेता एक जमाने में परचून की दुकान में पुड़िया बांधने का काम करते थे, आज हजारांे-करोड़ों के स्वामी हैं। इनके पैसों का कमाल तो देखिए कि सूबे के पीआरओ महेश जोशी भी उनका झोला ढोने को तैयार हैं। विदर्भ क्षेत्र में इस चुनावी मामले में जहां चव्हान-जोशी-बावनिया के आर्थिक लेनदेन का मामला सामने आ रहा है, वहीं संगठन के मामलों में मधुसूदन मिस्त्री की छवि एक नौसिखिएपन नेता के रूप में उभर कर आई है। शमशेर ढिल्लो, रामाचंद्रन, अश्करे टाक की तिकड़ी को जिस प्रकार नजरंदाज किया गया, वो भी इस हालात के लिए जिम्मेदार हैं। भुवनेश्वर कालिता थोड़ा-बहुत काम जानते हैं मगर वे गुवाहाटी में रहते हैं जिनके लिए दिल्ली दूर है। कुल मिलाकर जिन लोगों के हाथों में कांग्रेस जा रही है, वो राहुल विरोधी खेमा है। देखना है कि इस मामले में केंद्रीय नेतृत्व क्या रूख अपनाता है।
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