अखिलेश अखिल | खेल जारी है। इधर नितीश कुमार ने विश्वास मत हासिल किया उधर विपक्ष की शिकायत को पटना हाईकोर्ट ने मंजूर कर लिया है। यह नहले पर दहला है। बात राज्यपाल की भूमिका पर भी उठने वाली है।  लेकिन सच यह भी है कि यह सब भारतीय राजनीति का सौंदर्य भी है। लेकिन इन बातों को अभी भूल जाइये। हम आपको ले चलते है राजनीति की उस विसात की ओर जिसे जानकार आप चारा जाएंगे।

सत्ता और संविधान उलंघन एक दूसरे के पूरक ही तो है। आजाद भारत की राजनीति पर नजर डालिये तो पता चल जाएगा कि सत्ता पाने के लिए संविधान की धज्जियां किसने नहीं उड़ाई। कौन बचा है इस खेल से? पहले कांग्रेस ने इसकी शुरुआत की बाद में बीजेपी उसी राह का अनुसरण करने लगी। कौन है जो किसी पर उंगुली उठा सके। अभी हाल में ही उत्‍तराखण्‍ड, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश में जो हुआ वह तो सबको पता है है। बीजेपी ने अपनी सरकार बनाने के लिए संविधान की धज्जियां कैसे उड़ायी थीं आपको याद है ना। सत्ता और संविधान उलंघन की बानगी ही थे अरुणाचल के पूर्व मुख्यमंत्री जो फ़ासी पर लटक गए थे। फिर बिहार में जो हो रहा है और हुआ है उस पर है तौबा क्यों? लालू और नीतीश कुमार राजनितिक घाघ है और कम से कम इन दोनों को राजनीति सिखने की जरुरत किसी से नहीं है। राजनीति को बहुत नजदीक से समझने वाले भी जानते हैं कि बिहार में जो कुछ भी हुआ है उसके करता धरता लालू और नीतीश ही है। इस खेल में दोनों को लाभ है और नीतीश  की राजनीति आगे बढ़ती दिखती है। नीतीश की राजनीति के क्या कहने। उन्होंने अपना इस्तीफा देकर बीजेपी की सत्ता वाली मनसा को धार दिया और उसे फांसा भी। नीतीश जानते थे कि इस खेल से संविधानिक मूल्यों की छति होगी लेकिन उसे नजर अंदाज किया गया क्योंकि ऐसा कोई पहल बार नहीं हो रहा था। बीजेपी अब नीतीश के जाल में फस गयी है। इस पुरे ड्रामा में सबसे ज्यादा लाभ लालू प्रसाद को होता दिख रहा है लालू प्रसाद का मुश्लिम यादव समीकरण इस ड्रामा से और मजबूत होकर उभरेगा। और तेजस्वी की राजनीति धारदार होती चली जायेगी। संभव है कि लालू प्रसाद के साथ लोगों का भावनात्मक लगाओ भी बढे। उधर नीतीश की राजनीति ठीक बैठ गयी है। नीतीश पर लगभग 11 हजार करोड़ के ट्रेजरी घोटाला का आरोप है, बीजेपी के साथ रहने से यह घोटाला कभी जांच के दायरे में नहीं आएगा। और बीजेपी को क्या लाभ हुआ? मात्रा यही कि उसके खाते में 18 राज्य की सत्ता हो गयी। लेकिन बिहार की राजनीति और वहा का मिजाज कुछ और ही है। अन्य प्रदेशों में जहा हिंदूवादी संगठन गौरक्षा के नाम पर आतंक फैला रहे हैं वह बिहार में संभव नहीं। अब हिंदूवादी संगठनों को बिहार में अपनी सत्ता की याद आ गयी और वे गौमाता के नाम पर नर्तन करने लगे तो नीतीश के पाव बारह होते चले जाएंगे। यही पर नीतीश और बीजेपी का मामला फसेगा और नीतीश को लाभ होगा। ऐसे में नीतीश की मजबूरी अपनी निजी छवि को बचाने की होगी। अमित शाह की बीजेपी हमेशा की तरह आक्रामक रहेगी। नीतीश अपनी छवि ही बचाएंगे, उससे ज्‍यादा कुछ नहीं क्‍योंकि उन्‍होंने आज जो निवेश किया है वह 2019 के लिए है। वे जानते हैं कि बिहार का उनका कोटा पूरा हो चुका। अगले डेढ़ साल में राज्‍य की सवर्ण शहरी हिंदू जनता का परसेप्‍शन बीजेपी के खिलाफ़ हो जाएगा लेकिन नीतीश निजी रूप से और चमकेंगे। ऐसे में बीजेपी का गैर-यादव और गैर-मुस्लिम हिंदू कंसोलिडेशन का एजेंडा अपने आप फंस जाएगा। लोग फिर चाहेंगे कि नीतीश अकेले ही सरकार चलावें, लेकिन ऐसा शायद होगा नहीं क्‍योंकि नीतीश ने बीजेपी को बड़ी लकीर खींचने के लिए एंगेज किया है। बड़ी लकीर का मतलब दिल्‍ली की दावेदारी।
एक बार फिर नीतीश सही समय पर अंतरात्‍मा की आवाज़ पर बाहर आएंगे। तब तक अगर 18 दलों के विपक्ष के पास कोई अपना खांटी नेता नहीं पैदा हुआ, तो 2019 में नीतीश के पीछे आना सबकी मजबूरी बन जाएगी। ऐसे में बिहार में बीजेपी अनाथ हो जाएगी और लालू का होमवर्क भी पूरा हो चुका होगा। राबड़ी अब भी उनके पास हैं, मत भूलिए। अगर ऐसा नहीं भी होता है, तब भी नीतीश अकेले दम पर 2020 में बिहार को बचा ले जाने की स्थिति में होंगे क्‍योंकि बीजेपी से उनके अलग होने पर लालू के पीछे एकजुट  खड़ा मुस्लिम वोट बंटेगा और सवर्ण हिंदू शहरी मतदाता तो नीतीश का ही बना रहेगा। दोनों स्थितियां नीतीश के अनुकूल होंगी।
वर्तमान बिहार की राजनीति को हिकारत से नीतीश की ”घर वापसी” कहा जा रहा है। क्‍या वास्‍तव में पारंपरिक सेकुलरवाद का डिसकोर्स हमारी चुनावी राजनीति को तय कर रहा है? नहीं। इसीलिए बीजेपी विरोधी सारा विपक्ष ‘सेकुलर’ की नई परिभाषा के अभाव में छटपटा रहा है। नीतीश ने इस छटपटाहट की निस्‍सारता को समझते हुए बाकी दलों की तरह बीजेपी से अलग-थलग पड़ जाना स्‍वीकार नहीं किया, बल्कि उसको अपने तरीके से एंगेज किया है। अपने पाले में खींचा है अपनी शर्त पर। यह रणनीतिक है, भले ही अनैतिक हो। क्‍या नैतिकता आज की चुनावी राजनीति को तय कर रही है? कतई नहीं। इसलिए प्रस्‍तुत अध्‍याय को समझने में सेकुलरवाद और नैतिकता का पारंपरिक मुहावरा काम नहीं आएगा। मतदाता को भी इससे कोई मतलब नहीं है। आप देखिए कि आम शहरी सवर्ण हिंदू जनता में नीतीश-बीजेपी गठजोड़ को लेकर कोई आपत्ति नहीं है। वह विकास की बात कह रही है।
यहीं पर नीतीश बीजेपी के राजनीतिक मुहावरे को हथिया लेते हैं और मोदी के समानांतर होकर अपनी निजी प्रोफाइल को बड़ा बनाने की कवायद में पढ़े-लिखे भाजपा-विरोधी लोगों की नफ़रत झेलना भी स्‍वीकार कर लेते हैं। वे जानते हैं कि आज का मतदाता दो चीज़ों पर वोट करता है। भले ही आडम्बर हो लेकिन साफ़-सुथरा सशक्‍त व्‍यक्तित्‍व और विकास। यह मुहावरा मोदी का दिया हुआ है। नीतीश ने बडी चालाकी से उसमें अपनी डंडी मार दी है। जब बीजेपी के गौरक्षकों से मामला फंसेगा, तो वे बिहार में बैठकर देश भर के मतदाताओं को संदेश देने का मौका नहीं चूकेंगे। इस तरह मोदी के बरक्‍स वे अपनी प्रोफाइल पीएम मैटेरियल वाली बनाते जाएंगे और संघमुक्‍त भारत के अपने नारे में भी रह-रह कर ग्रीस लगाते रहेंगे। ज़ाहिर है, ऐसा करना उन्‍हें मोदी से अलगाएगा नहीं, बल्कि उनके समानांतर बनाएगा।
चुनावी राजनीति में नैतिकता, सेकुलरिज्‍म या दलबदल-गठजोड़ की अवसरवादिता आज मायने नहीं रखती है। निजी व्‍यक्तित्‍व और विकास का मुहावरा ही चुनाव जीतने का मंत्र है। यह जनता के लिए भले धोखा है, लेकिन जनता वोट इसी पर देती है। इस लिहाज से नीतीश दरअसल शेर की सवारी कर रहे हैं क्‍योंकि कांग्रेसरूपी हाथी की सवारी अगले सात साल तक कहीं नहीं पहुंचाएगी, इसे वे जानते हैं। या तो वे कहीं पहुंच जाएंगे या फिर खत्‍म हो जाएंगे। फांसी लगाकर मरने से यह विकल्‍प बेहतर है।

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