ECI Notice to Jharkhand Govt. Inset CM Raghubar with Rajbala, Home secretary S K G Rahate, ADG Anurag Gupta amd Press Advisor to Jharkhand CM Ajay Kumar

रितेश सिन्हा। झारखंड की रघुवर सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। मुख्यमंत्री की रसूखदारी खतरे में है और अधिकारियों की मौज है। एक तरफ तो रघुवर सरकार 1000 दिनी उपलब्धियों का बखान करने के लिए जश्न में डूबी हुई है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय निर्वाचन आयोग की वक्र दृष्टि भी सरकार के लिए भारी पड़ने वाली है। आयोग ने 13 जून 2017 को पत्र लिखकर स्पेशल ब्रांच के एडीजी अनुराग गुप्ता और रघुवर दास के तत्कालीन राजनीतिक सलाहकार और वर्तमान में मीडिया सलाहकार अजय कुमार पर आईपीसी की धारा 171 बी और 171 सी के तहत भ्रष्ट आचरण अपनाने और रसूख के जरिए वोटों को भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में करने के संगीन आरोप पर सरकार को अपना रूख स्पष्ट करने को कहा है।
आयोग के मुख्य सचिव वारिंदर कुमार ने झारखंड सरकार की मुख्य सचिव राजबाला वर्मा को लिखे गए पत्र जिसका पत्रांक संख्या 31बी/सीएस-जेएच/2/2016-बीआईईएन है, उसके जरिए सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है। पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान विधायक बाबू लाल मरांडी (अध्यक्ष झारखंड विकास मोर्चा) के लिखित शिकायत पर संज्ञान लेते हुए आयोग ने राज्यसभा चुनाव के दौरान भ्रष्ट आचरण अपनाए जाने पर झारखंड सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। विदित हो कि आरोप सीधे तौर पर रघुवर सरकार की आंख, नाक और कान बने अधिकारियों और करीबियों पर है। मामला जून 2016 का है जब भाजपा के राज्यसभा पद के उम्मीदवार और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी और महेश पोद्दार के पक्ष में मतदान करने के लिए अनुराग गुप्ता और अजय कुमार ने पूर्व विधायक योगेंद्र साव पर दवाब बनाकर उनकी पत्नी व कांग्रेसी विधायक निर्मला देवी पर इन दोनों उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने को कहा था। साव ने स्वीकार भी किया है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास खुद उनसे मिले और भाजपा के दोनों प्रत्याशी के पक्ष में मतदान के लिए राजनीतिक दवाब बनाया। हालांकि इस घटना की पुष्टि करने वाले साक्ष्य वे आयोग के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर पाए हैं। वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक विशुनपुर चामरा लिंडा ने रघुवर सरकार पर यहां तक आरोप मढ़ दिया कि अगर उन्होंने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं किया तो पुरानी फाइलों को निकालकर उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने एक जांच कमिटी गठित की जिसने विधायक निर्मला देवी और चामरा लिंडा के बयानों को भी रिकार्ड किया। कई राजनीतिक सुरमा इसकी आड़ में नेपथ्य से अपनी राजनीति चला रहे हैं। इन्हीं नेताओं ने गुपचुप तरीके से काम को भी अंजाम दिया। विधायक प्रदीप यादव और प्रकाश राम के वोट भी संदेह के दायरे में हैं। वहीं कांग्रेस विधायक पिनाकी देवेंद्र सिंह जो वोट के दिन अनुपस्थित रही, उन्होंने भी अपरोक्ष रूप से भाजपा के पक्ष को ही मजबूत किया। हालांकि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने इस मामले को जोरशोर से उठाया था, मगर सूबे की कमान कमजोर नेतृत्व मे होने की वजह से बातें हवा-हवाई होकर रह गई। कांग्रेस अध्यक्ष सुखदेव भगत और तत्कालीन प्रभारी वीके हरिप्रसाद की आपसी मिलीभगत में बात आई-गई हो गई। उसके उपरांत बाबू लाल मरांडी ने आयोग में लिखित शिकायत दर्ज कराई। झारखंड मुक्ति मोर्चा के सदस्य संजीव कुमार ने इस संबंध में एक सीडी भी आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया जिसमें अजय कुमार और अनुराग गुप्ता के साथ योगेंद्र साव से बातचीत का पूरा साक्ष्य है। इतना ही नहीं जेएमएम के कार्यकारी अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने तो इस बाबत केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की, मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात।
जब आयोग द्वारा इस पत्र के कार्रवाही के बारे में हमने गृह सचिव एसके जी रहाटे से उनके निजी मोबाइल नंबर पर बातचीत की तो उन्होंने गोलमोल बातें की और कहा कि विभागीय कार्यवाही में समय तो लगता है। इस सक्षम आईएएस अधिकारी की यह दलील भी गले नहीं उतरती कि किसी चिट्ठी का जवाब तैयार करने में तीन महीने से अधिक का समय लग सकता है, वो भी तब जब इससे केंद्र और राज्य दोनों ही भाजपा कठघरे में नजर आती हैं। देश के राजनीतिक इतिहास में यह अपने तरह का पहला ऐसा मामला है जिसमें इस तरीके से चुनाव आयोग ने अपनी सक्रियता दिखाई है, खासकर तब जब केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही सरकार हो। मुख्य सचिव राजबाला वर्मा को पत्र लिखकर आयोग ने जवाब मांगा लेकिन रघुवर और उनकी चहेती अधिकारी राजबाला आयोग की इस गूगली को झेल नहीं पाई। लगभग चार महीने के भीतर दो चिट्ठी लिखकर आयोग ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं और उसका झारखंड सरकार से कड़े शब्दों में जवाब मांगा है, साथ ही इसमें रघुवर सरकार के लिए सख्त संदेश भी है।
देखा जाए तो रघुवर, राजबाला और रहाटे की तिकड़ी निर्वाचन आयोग को जवाब देने में आनाकानी करती आई हैं लेकिन आयोग ने चार महीने में ही एक बार पत्र लिखकर और दुबारा उस पर रिमांइडर भेज कर रघुवर सरकार को ही कठघरे में ला खड़ा किया। रिमांइडर में शिकायत की कापी भी संलग्न है जो 37 पृष्ठों की है और लिखित गवाहों के बयान भी 5 पन्नों का है। इसे मुख्यमंत्री के भविष्य से जोड़कर भी देखा जा सकता है। कुछ दिनों पहले केंद्र सरकार के एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री झारखंड के दौरे पर थे, जो संघ के करीब भी माने जाते हैं, उन्होंने भी रघुवर सरकार की कामकाज का लेखा-जोखा इकट्ठा किया। बस फिर क्या था ये तिकड़ी फंस गई। रघुवर, राजबाला और रहाटे की तिकड़ी भाजपा संगठन के निशाने पर आ गई। आपको बता दें कि रहाटे झारखंड कैडर के 1990 बैच के आईएएस अधिकारी हैं और स्टेट ग्रेडेशन की सूची में इनका 26वां स्थान है। इनसे सीनियर आईएएस अधिकारी के रहते 90 के बैच के इस अधिकारी को गृह सचिव बनाने के पीछे कौन सा खेल है, इसकी धीरे-धीरे परतें खुल रही हैं। विदित हो कि सबसे सीनियर अधिकारी 1984 बैच के डीके पांडे हैं। वे संघ के प्रचारक रहे और वर्तमान में भाजपा के प्रचार प्रमुख गणेश शंकर मिश्रा के समधि भी हैं और रहाटे से कई साल सीनियर भी। उनके अलावा 1985 बैच के अमित खरे और सुधीर त्रिपाठी, 1986 बैच के देेवेंद्र कुमार तिवारी, संतोष कुमार सतपथी और नंद किशोर मिश्रा, 1987 बैच के इंदू शेखर चतुर्वेदी और सुखदेव सिंह, 1988 बैच की अलका तिवारी और एल वी ख्यांते जैसे सक्षम आईएएस अधिकारी हैं। मगर इन सबको दरकिनार कर रहाटे को गृह सचिव बनाने के पीछे मुख्यमंत्री और सूबे की मुख्य सचिव का क्या खेल है, यह इस चिट्ठी के कार्रवाही की लीपापोती और ढील से समझा जा सकता है।
रघुवर दास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद माने जाते रहे हैं। कारण एक तो जातिगत समीकरण मोदी से मेल खाता है, दूसरा नरेंद्र मोदी के व्यापारिक मित्र अदानी जिनका आर्थिक कारोबार देश-विदेश में तेजी से फैल रहा है, उसी अदानी ने अपने कारोबार से झारखंड को पूरी तरह से जकड़ लिया है। रघुवर सरकार पर भ्रष्टाचार के अलावा सरकार चलाने का अनुभव का न होना, उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरा। यही वजह रही कि राजद सुप्रीमो लालू यादव की कभी करीबी रही नट राजबाला अपने इशारों पर रघुवर को भी नजर रही है और गृह सचिव बने एसकेजी रहाटे के साथ अनेक नौकरशाह सरकार को अंधेरे में रखकर घी पी रहे हैं। इन्हीं आरोपों की जांच के लिए देश के ‘शाह के के इशारे पर भाजपा के ‘शाह‘ भी रघुवर सरकार के 1000 दिनों जश्न के उपलक्ष्य पर अतिथि बनकर बातों की पूरी टोह ली। विधायकों, मंत्रियों, अधिकारियों से सरकार का पूरा लेखा-जोखा लेकर समझा। सारी बातें रघुवर के नेतृत्व में चल रही सरकार के नकारात्मक पक्ष को ही उजागर करती है। जिस स्वच्छता अभियान की शुरूआत करने वाले पीएम मोदी झारखंड में सरकार की स्वच्छता का ठीकरा अपने सिर नहीं लेना चाहते। इस बात उन्होंने कभी गुजरात के अधिकारी रहे और वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त एके जोती के जरिए निर्वाचन आयोग को तलवार बनाया। आयोग ने पत्र के जरिए रघुवर सरकार की कार्यशैली पर ही गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया।
इस पूरे प्रकरण में झारखंड कांग्रेस खेमे में बंटी हुई है। सूबे के बड़े कांग्रेसी नेताओं की चुप्पी के बीच प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता अजय राय ने कहा कि किसी भी विभागीय पत्र के जवाब के लिए तीन महीने का वक्त एक लंबी अवधि है। उन्होंने आरोप भी लगाया कि सीएम पीएम से अपने निजी संबंधों का हवाला देते हुए भाजपा हाईकमान को गच्चा देने के मूड में है, पर अमित शाह की व्यक्तिगत दिलचस्पी कोई नया खेल भी दिखा सकती है और रघुवर की जगह किसी दूसरे नेता को कमान सौंपी जा सकती है। सूत्र बताते हैं कि सुदर्शन भगत, जयंत सिन्हा और करिया मुंडा पर सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है। देखा जाए तो आयोग के पत्र पर झारखंड सरकार का जवाब राजबाला भी जानती हैं और रहाटे भी। जवाब इसलिए नहीं दिया जा रहा क्योंकि इससे सीधे तौर मुख्यमंत्री की जवाबदेही भी तय होगी और यह जवाब रघुवर दास के साथ उनके चहेते अधिकारियों के जाने की तारीख भी पक्की कर देगा। आयोग इस मामले में गंभीर भी दिख रहा है। अगर मामला साबित हुआ तो रघुवर सहित भाजपा को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है जिसकी शुरूआत अब हो चुकी है। अचानक दिल्ली तलब भी इसी की एक कड़ी है। देखना है कि आने वाले समय में झारखंड में भाजपा के ये कर्णधार किस प्रकार का गुल खिलाते हैं ?
Kindly give your feedback on riteshkrishnasinha@gmail.com or you may contact on 9810941667 regarding this story.

loading...
loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here