राहुल की बुलंदी में अड़चन भरूच का अहमद

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रितेश सिन्हा। राहुल जिस तरीके से गुजरात में गरज रहे हैं, उससे सूबे-गुजरात के युवा, किसान, व्यापारी में गजब का जोश उमड़ रहा है। मगर कइयों के दिल पर सांप लोट रहे हैं। भाजपा का राहुल पर राजनीतिक हमला करने का अब तो हौसला नहीं बचा है, हां बचाव की मुद्रा में जरूर पार्टी नजर आ रही है। तभी तो पहले राम, फिर गंगा, फिर यमुना, फिर मंदिर और अब पीएम मोदी को भी ‘नाना-नानी‘ याद आ रहेे हैं। तभी तो अपने राजनीतिक विरोधी राहुल गांधी के नाना तो छोड़िए, परनाना तक को याद कर रहे हैं। देश-विदेश में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले पीएम मोदी बच्चों की तरह नाना-नानी के दोहे दोहरा रहे हैं। लेकिन अब इनका भरूच के अहमद वैसा साथ नहीं दे पा रहे हैं। अहमद एक तरफ तो मजबूती से मोदी के साथ पर्दे के पीछे से सारा खेल खेल भी रहे हैं, वहीं राहुल के साथ लटके भी दिखाई देते हैं।
देखा जाए तो अहमद पटेल पूरे तरीके से राहुल को नाकामयाब करने की अपने नापाक कोशिशों को अंजाम देने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। ताजा वाक्या सोमनाथ मंदिर का है जहां राहुल गांधी माथा टेकने गए थे। उनके साथ अहमद भी लटक गए। अभी तक कांग्रेसियों में अहमद पटेल का खौफ बाकी है। उन्होंने राहुल के साथ चल रहे अपने कारिंदे जिसको उन्होंने मीडिया डिपार्टमेंट में फिट किया हुआ है, मनोज त्यागी नामचीन सरीखे व्यक्ति को मंदिर के उक्त रजिस्टर में नाम अंकित करने को कहा। उस रजिस्टर में केवल गैर-हिन्दू के विवरण को रखा जाता है। मनोज त्यागी, जिन्हें अहमद प्यादे के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं और अपने चिरविरोधी और गांधी परिवार के निकटतम वी. जार्ज के यहां भी उन्हीं के जरिए जासूसी करवाते रहे हैं। सोमनाथ मामले में भी उन्होंने इसी प्यादे का बेहतरीन इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया और राहुल के साथ पूरे कांग्रेस को उलझाने की बड़ी साजिश को अंजाम दिया।
ये अहमद का ही कमाल था कि राहुल गांधी के नाम से मंदिर परिसर में रखे रजिस्टर में हस्ताक्षर तक मनोज त्यागी ने खुद कर दिए, जबकि ऐसा करने का तो छोड़िए, पार्टी को छोड़ गए कांग्रेसी ऐसा करने का साहस नहीं दिखा सकते। यानी एक चाल से दो मात। एक तरफ तो राहुल की घेराबंदी, दूसरी तरफ अहमद खुद को बड़ी सफाई से बचा गए। लोकसभा चुनाव के करारी हार के बाद देश भर के कार्यकत्र्ताओं के साथ समीक्षा करते हुए ए.के. एंटोनी ने कांग्रेस उपाध्यक्ष को अपनी रिपोर्ट दी थी जिसमें अल्पसंख्यक तुष्टिकरण से कांग्रेस को बचने को कहा था और इस रिपोर्ट का लब्बोलुआब है कि कांग्रेस के खिलाफ भाजपा को अपना जनाधार बनाने का मौका स्वयं कांग्रेस ने दिया। राहुल और उनकी टीम ने इस रिपोर्ट को तीन साल अपनी कसौटी पर कसा और कई बार उस पर विचार-विमर्श के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष और उनकी कोर टीम ने देश भर के निजी कंपनियों द्वारा सर्वेक्षण कराए और सर्वेक्षण के रिपोर्ट के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि बहुसंख्यक समाज की अनदेखी कर वे सत्ता में वापस नहीं हो सकते। पहले भाजपा मंदिर की राजनीति में उलझा कर हर बार अपनी ताकत में इजाफा करती थी। यूपी में पूरे तरीके से नकार दिए गए मुस्लिम समाज को पूर्ण बहुमत से सरकार में योगी चले आए। बस फिर क्या था यूपी की हार से हिले राहुल हिन्दुत्व का एजेंडा भाजपा से छीन लिया। गुजरात में चुनाव की शुरूआत अशोक गहलोत के साथ मंदिर दर्शनों के साथ शुरू की। राहुल ने इस बात का भी खास ख्याल रखा कि दिग्विजय बेलगाम न हो सकें, इसका भी इंतजाम कर दिया।
दिग्गी भी पिछले 15 सालों से कांग्रेस संगठन में रहकर अपने बड़बोलेपन से भाजपा को बहुत लाभ पहुंचा रहे थे। आपको बता दें कि दिग्विजय, अहमद और मोदी की तिकड़ी की आपस में खूब छनती है। जब दिग्विजय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब नरेंद्र मोदी सूबे में भाजपा के महामंत्री और प्रभारी नियुक्त किए गए थे। तभी से उन दोनों की यारी अब जान से प्यारी है। वहीं मोदी के बुरे दिनों में अहमद उनकी वित्तीय जरूरतों को भी पूरा करते रहे हैं और मोदी ने भी इसका कर्जा उन्हें राज्यसभा भिजवा कर चुकाने की कोशिश की है। तमाम विरोधाभास और अपने अमित भाई से भी लोहा लेते हुए अपने पुरानी मित्रता को निभा दी। अहमद जानते हैं कि अपने राजनीतिक कुचक्रों की वजह से वे दोबारा किसी सदन में नामित नहीं हो पाएंगे।
अहमद का तिलिस्म भी टूट चुका है और वो भी राहुल के आने के बाद टूट चुके हैं। उनका रूतबा हवा-हवाई है। कांग्रेस गुजरात चुनाव के बाद अहमद के बारे में कोई बड़ा फैसला लेगी। कल के अहमद कहीं केवल ‘भाई‘ ही बनकर न रह जाएं। ऐसा नहीं है कि अहमद पटेल कोई कोशिश नहीं कर रहे। उन्होंने शहजाद पुनावाला से राहुल के अध्यक्षीय पर ही सवाल उठवा दिए। शहजाद को कौन बताए कि जब उस्ताद की हैसियत दो टके की हो तो उन्हें कौन पूछता। कहीं राहुल बिग्रेड ने उन्हें पहचान लिया तो भाजपा के शरण में ही जाना पड़ सकता है। शहजाद के राजनीतिक ज्ञान पर भी आश्चर्य होता है। अभी तो चुनावी प्रक्रिया शुरू भी नहीं हुई उन्होंने अभी से अध्यक्ष पद को फिक्स कर दिया। शायद वो इस फिक्सिंग को बेहतर जानते होंगे क्योंकि अहमद और दिग्विजय अपने प्यादों को फिक्स कर फिट करते रहे हैं। ऐसे ही एक भाई साहब और हैं, नाम है मनीष चतरथ। अब इन्हें भाई साहब तो कहना पड़ता है। कार्पोरेशन का चुनाव तक नहीं जीत पाते, पड़ोसियों तक को उनका पता नहीं, मगर अहमद की कृपा से पार्टी में सचिव की हैसियत भी है और कांग्रेस संगठन में वित्तीय भार भी संभाले हुए हैं। कहने को लगभग 50 के करीब सचिवों की लंबी सूची है, मगर कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वित्तीय कारोबार मनीष चतरथ संभालते हैं। कांग्रेस में भाई साहब के जासूसों की कोई कमी नहीं। प्रकाश जोशी हैं तो सचिव, मगर काम इनकी ‘करमचंद‘ वाली हैं। दिन भर गुपचुप तरीके से रिपोर्ट लेकर शाम को अहमद के डेरे पर जाते ही उगल देते हैं। दिल्ली में बैठे-बैठे देवभूमि से दो चुनाव भी लड़ लिए, मगर इतनी बुरी हार कि जीतने वाले को मिलने वाले वोटों से आधे से भी कम वोट बटोर पाए। एक और भाई के भाईसाहब हैं, नाम प्रणव झा हैं। ये वहीं प्रणव झा हैं जिन पर गुलाम नबी आजाद और अजय माकन के संवादादाता सम्मेलन में कश्मीर को पाक में दिखाने का ठीकरा फोड़ा गया था। दिखावे के लिए तो उनको तो मीडिया टीम से थोड़े समय के लिए आउट कर दिया गया था, मगर अब इन्हें एआईसीसी का सचिव बना दिया गया क्योंकि ये अहमद पटेल के साजिशों को बखूबी अंजाम देते आए हैं। इसके अलावा एक नाम अलंकार का भी है। ये साहब तो राहुल से मिलने का मैच फिक्सिंग करते हैं। वैसे तो इनका काम आरजी आफिस में है, राहुल के पीछे रहते हैं, लेकिन आरजी आफिस की सारी खबर गोपनीय तरीके से भाई तक पहुंचाने का जिम्मा ईमानदारी से निभाए हुए हैं। अपने कारिंदों के माध्यम से अहमद भाई तय करते हैं कि किसी की रिक्वेस्ट राहुल गांधी को पहुंचानी है और किसको रिजेक्ट करनी है। लेकिन राहुल की ताजपोशी को बेचैन कांग्रेसी अब इन सभी भाईयों का हिसाब चुकता करने के फेर में हैं और जल्द ही आपको इसके परिणाम नजर आने लगेंगे। गुजरात में अहमद के चार और दिग्गी के दामाद नौजवान को टिकट मिलने के बाद आप स्वयं समझ सकते हैं कि आने वाले समय में इनकी हैसियत क्या होगी ? कांग्रेस कार्यसमिति में अहमद के वफादारों को राहुल ने जिस तरीके से किश्तों में काटा है, उससे आप कांग्रेस उपाध्यक्ष की कार्यशैली का अंदाजा सहज लगा सकते हैं।
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