नवनिर्वाचित विधायक जिग्नेश मेवानी की दिल्ली में हुंकार-रैली के साथ हुई दस्तक। 42 संगठनों ने अपनी ताकत लगाई। हजार दो हजार के करीब लोग भी आये। रैली में हुंकार ऐसा मानो ये युवा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का आगाज कर रहे हों। यह भारत छोड़ो आंदोलन, ‘भाजपा छेड़ो आंदोलन’ में परिवर्तित होता नजर आया। भाजपा और भागवत से आजादी के नारे बुलंद होते नजर आये।

इस हुंकार रैली में पिक्चर अभी और कितना बांकी है ‘ की आस में पूरे दिन गुजर गए, पर वक्ताओं की वैचारिक-दीनता कम होती नजर नही आई। कन्फ्यूज्ड-क्रांतिकारी और उनकी यह कन्फ्यूज्ड-क्रांति सबको कन्फ्यूज्ड कर दे रही थी।

  जय भीम, जय-जय, जय-जय जयभीम का जयकारा भगवती-जागरण का ही अहसास करा रहा था। वामपंथी-सम्प्रदाय की यह नई संगीत-संध्या एकदम पॉप-म्यूजिक की तरह थी। शास्त्रीय-वामपंथी मंच से नदारद थे। नीला आसमान और लाल सलाम। ये मंच के सामने संसद-मार्ग की गली में चना चबाने पर मजबूर थे। जाति, वर्ण और वर्ग-संघर्ष पर बूढ़े वामपंथी चने के साथ इन शब्दों को भी घून की तरह पीसे जा रहे थे। कामरेड विमल के खट्टे हुए इकट्ठे दांत भी कम शोर नही मचा रहे थे। संसद मार्ग का बूढा बरगद और बूढ़े वामपंथी इतिहास से ज्यादा साहित्य हो रहे थे। कामरेड संदीप राउ बहुत देर से हाथ मलते हुए नजर आए। जिज्ञासावश कारण पूछा तो उन्होंने मसली हुई चैनी दिखाई। बीबीसी यानी बौद्धिक वर्धक चूर्ण स्वनामधन्य हो रहे थे। वामपंथ को तत्काल यह बौद्धिक-चूर्ण चाहिए। संदीप एक संदेश ही थे जो बिना दिए खिसक लिए। कामरेड हर्ष को मूर्छित होते देख। कामरेड उमाकांत बुझते जिगर से माचिस निकाल कर दी। जलती रही बीड़ियाँ और उड़ते रहे धुएं।
    बाबा भरोसे वामपंथ। बाबा यानी बाबा साहेब। नजीब के खोने की और आगे होने की आशा अब ‘रावण’ से। बिना जय-भीम का लाल सलाम संभव नही। समय के साथ यह समझदारी शुभ ही है। भूमिहीन हुए वामपंथ को भारत की भूमि चाहिए। शायद यह सियासी जमीन दलितों के बिना संभव भी नही। रणवीर सेना के भूखे भूमिहार और बेलछी के भूखे चमार एक साथ नही हो पाए। कम्युनिस्ट इन्हें क्लास दे नही पाए। बिहार के जातीय संघर्ष ने लालू को तो जमीन दी और बिहार में लाल सलाम केवल अदावत और तमीज बनकर रह गए। यही स्थिति लगभग हर जगह रही।
    वामपंथ का नया संस्करण! वर्ग-संघर्ष से शिफ्ट होकर वर्ण-संघर्ष पर आके टिके हुए थे। दास-कैपिटल की दासता को छोड़ मनुस्मृति की दासता से मुक्ति की आवाज शोर मचा रही थी। मार्क्सवाद गए तेल लेने।
    मनुवाद के भूत मंच को घेर रखा था। दास-कैपिटल के बदले दास-तुलसी की चौपाईयाँ ही अवलंब बन रही थी। कन्हैया की मुरली में मार्क्सवादी तान। पुनरुत्थानवादी प्रतीक इनके संवाद के सहारे बन रहे थे। वह आइडियोलॉजिकल-शिफ्टिंग था या डिरेलमेंट समझ से परे था। एकम सत्ता वामपंथी वहुधा बदन्ति…!
    इस रैली में समर्थक से ज्यादा संगठन ही मौजूद थे। बैनर पचहत्तर हमारे! कार्यकर्ता से ज्यादा मीडिया के कैमरे ही कैमरे दिखाई दे रहे थे। क्रांति का चश्मदीद गवाह बनने वाले मीडिया के कैमरे खाली पड़ी सारी कुर्सियों की तरफ ही घूमती नजर आई। अनस्किल्ड और अनआर्गेनाईज्ड लीडरशिप अपने अभाव को ढकने के लिए सैद्धांतिक-आधार प्रदान करते नजर आए। मीडिया नाहक ही बदनाम हुई मोदी तेरे लिए ? सभी नेता मीडिया-ट्रायल पर प्रश्नचिन्ह तो अवश्य ही लगाए, पर कोई पदचिन्ह छोड़ने में नाकाम सिद्ध हुए।
    कोई कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया नही, वल्कि इंडियन होती कम्युनिस्ट की ‘पार्टी’ थी। थोड़े वंचित और थोड़े बुर्जुआ ! कॉकटेल कम्युनिस्ट! यह बिल्कुल ही बदली बदली सी थी। हमें चाहिए आजादी के सारे नारे फ़िल्टर कर लाये गए थे। नारों में नमी मौजूद थी। नेता मंजे नही सहमें हुए थे। भाषण ऐसा मानो पुरानी भूलों का परिमार्जन हो। मुँहजोर मार्क्सवादी माईक पर भी जोर से ही बोल रहे थे। हुंकार-रैली में हुंकार का मतलब केवल जोर-जोर से बोलना भर ही शेष था। सभी नेता प्रोटेस्टेंट और प्रतिक्रियावादी की तरह ही थे। किसी क्रियावादी तत्वों का अभाव था। युवा-उत्साह पर विवेक और विचार का कोई नियंत्रण ही नही था।
बाबा साहेब वामपंथ का कितना बेड़ा पार लगायेंगें यह देखना बांकी है।
     बहुजन-हिताय को सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय में बदलने की मजबूरी समझ में आ रही थी। वंचित और दलित शब्द सर्वस्पर्शी हो रहे थे। यह जातीय सीमा तोड़ रहा था। सभी जातियों के दलितों के लिए यह रैली नई आस जगा रही थी। दलितों के प्रश्नों को केवल दलित ही उठाये, स्वानुभूति और सहानुभूति के पुराने मिथक ढह रहे थे। दलित-राष्ट्र के बदले दलितों के प्रश्न राष्ट्रीय हो रहे थे। यह एक असली राष्ट्रवाद की घोषणा थी।
      लंकेश का मारा जाना और रावण का जेल जाना, ये सब मंच के विरथ ‘रघुवीरा’ के लिए असह्य थे। रावण की मुक्ति के शायला अवश्य परेशान थी। तमाम अराजकता के बाद भी इस हुंकार रैली से एक नई संभावना जन्म ली है। इस संभावना को सींचने और संरक्षित करने की जरूरत है।
      गुजरात का चुनाव-परिणाम एक संकेत है। पर यह संकेत भाजपा के लिए कोई बड़ा संकट साबित नही होगा। संघ की आत्मा जिस जंघा में बसती है वहां कोई प्रहार होता नही दिख रहा है। मूवमेंट फ़ॉर मूवमेंट का कोई मतलब नही होता। प्राथमिकता का चयन भी सावधानीपूर्वक हो तो बदलाव की बात संभव है। जुमलों को जबाव जुमलों से देना बदलाव की संभावना को शून्य करता है। मार्क्सवाद और मनुवाद का विरोध और समर्थन एक ‘वाद’ की ही यात्रा है। शायद एक ही रस्सी के दो छोड़। भाजपा के लिए जिग्नेश भी कोई नया फ्रंट नही हो जाय, इस आशंका से सब आशंकित हैं। पर समय के साथ जिग्नेश में परिपक्वता भी आएगी। थोड़ी इनकी त्रिज्या बड़ी होगी तो इनकी परिधि भी बड़ी होगी। अतिवाद और यांत्रिकता से बचने की जरूरत होगी। भाववाद का अभाव भी इन्हें दूर करना होगा।
       बुद्ध के पास माईक और मंच नही होते मारक विचार होते है। उनके लिए पूरा संसार ही मंच हो जाता है।
देश में बदलाव के बहुत प्रयोग हुए। ये भी एक प्रयोग होंगें अपने संभव परिणामों के साथ। समाज जीवन की शून्य होती प्रतिरोधी शक्तियों के बीच जिग्नेश एक बाल अरुण है। इस अरुणिमा को सलाम और जय भीम करता हूँ।
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